सुप्रीम कोर्ट ने बेंगलुरु महानगर परिवहन निगम (बीएमटीसी) के एक बस ड्राइवर द्वारा दायर आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए उसकी छह महीने की जेल की सजा को ₹5,00,000 के जुर्माने (मुआवजे) में परिवर्तित कर दिया है। यह राशि सड़क दुर्घटना का शिकार हुई महिला के परिवार को प्रदान की जाएगी। शीर्ष अदालत ने आईपीसी की धारा 304-ए (लापरवाही से मौत) और मोटर वाहन अधिनियम (एमवीए) के तहत ड्राइवर की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 की धारा 3 के तहत उसे केवल डांट-फटकार (Admonition) के बाद रिहा करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि इस दोषसिद्धि के कारण ड्राइवर की बीएमटीसी में नौकरी या सेवा पर किसी भी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता, महादेवन्ना डी.एम., बेंगलुरु महानगर परिवहन निगम (बीएमटीसी) में ड्राइवर के रूप में कार्यरत थे। 27 दिसंबर 2011 को शाम लगभग 7:15 बजे, जब वे बीएमटीसी की बस (पंजीकरण संख्या KA-01-F-3716) चला रहे थे, तब सड़क पार कर रही एक पैदल यात्री रंगम्मा को बस से टक्कर लग गई। इस हादसे में उन्हें गंभीर चोटें आईं और बाद में अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया। अपीलकर्ता ने इस दुर्घटना की सूचना पुलिस को नहीं दी थी।
मामले में एफआईआर दर्ज होने और जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल किया। 31 अक्टूबर 2012 को ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को आईपीसी की धारा 279 (लापरवाही से वाहन चलाना), धारा 304-ए (लापरवाही से मृत्यु कारित करना) और मोटर वाहन अधिनियम की धारा 134(बी) सहपठित धारा 187 के तहत दोषी करार दिया। इसके खिलाफ अपीलकर्ता ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (प्रथम अपीलीय अदालत) के समक्ष अपील दायर की, जिसे कोर्ट ने 1 फरवरी 2013 को खारिज कर ट्रायल कोर्ट के फैसले की पुष्टि की थी।
इसके बाद, अपीलकर्ता ने कर्नाटक हाईकोर्ट (बेंगलुरु) में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने 3 मार्च 2022 को इस याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आईपीसी की धारा 279 के तहत अपीलकर्ता की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने धारा 304-A और एमवीए के तहत उसकी दोषसिद्धि तथा ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्धारित की गई सजा को यथावत बनाए रखा।
हाईकोर्ट के इस आदेश से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की। 4 अक्टूबर 2024 को नोटिस जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता की सजा को निलंबित कर दिया और उसे आठ सप्ताह के भीतर ₹5,00,000 जमा करने का निर्देश दिया था। इस आदेश के अनुपालन में अपीलकर्ता ने रजिस्ट्री के पास उक्त राशि जमा करा दी, जिसे बाद में फिक्स्ड डिपॉजिट में तब्दील कर दिया गया। मामले में मृतका के परिवार के सदस्यों को भी पक्षकार बनाया गया था।
दोनों पक्षों की दलीलें
मामले की अंतिम सुनवाई 23 अप्रैल 2026 को हुई। इस दौरान अपीलकर्ता के वकील ने न्यायालय से अनुरोध किया कि उनके मुवक्किल के मामले पर प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 की धारा 3 के तहत विचार किया जाए। उन्होंने अपनी दलील में कहा कि आईपीसी की धारा 304-ए के तहत दी जाने वाली अधिकतम सजा दो वर्ष है, जिसे देखते हुए अपीलकर्ता इस अधिनियम के तहत प्रोबेशन (परिवीक्षा) का पूर्ण पात्र है।
दूसरी ओर, प्रतिवादी (राज्य सरकार) के वकील ने निर्देशानुसार कहा कि यदि अपीलकर्ता द्वारा जमा की गई ₹5,00,000 की राशि मृतका के परिजनों को मुआवजे के रूप में वितरित कर दी जाए, तो उन्हें अपीलकर्ता की इस प्रार्थना पर कोई आपत्ति नहीं है।
अदालत का विश्लेषण
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 की धारा 3 के कानूनी प्रावधानों के तहत अपीलकर्ता की पात्रता का आकलन किया।
न्यायालय ने उल्लेख किया:
“धारा 3 अन्य बातों के अलावा न्यायालय को कुछ अपराधियों को डांट-फटकार के बाद रिहा करने की शक्ति देती है यदि वे ऐसे अपराध के दोषी पाए जाते हैं जिसमें दो वर्ष से अधिक की कैद की सजा का प्रावधान न हो।”
अपीलकर्ता के विरुद्ध लगाए गए विशिष्ट आरोपों पर विचार करते हुए खंडपीठ ने कहा:
“वर्तमान मामले में अपीलकर्ता को आईपीसी की धारा 304-ए सहपठित मोटर वाहन अधिनियम की धारा 134(बी) और धारा 187 के तहत दोषी ठहराया गया है। इनमें से किसी भी आरोप में दो वर्ष से अधिक की सजा निर्धारित नहीं है, इसलिए अपीलकर्ता 1958 के अधिनियम की धारा 3 की अनिवार्य शर्तों को पूरा करता है।”
न्यायालय का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता की याचिका को स्वीकार करते हुए मामले का निपटारा कर दिया। कोर्ट ने अपीलकर्ता की दोषसिद्धि की पुष्टि की, लेकिन साथ ही निर्देश दिया कि “उसे कारावास की सजा देने के बजाय केवल उचित डांट-फटकार के बाद छोड़ दिया जाए।”
ड्राइवर की नौकरी और भविष्य की सेवा सुरक्षा के पहलू पर निर्णय लेते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि 1958 के अधिनियम की धारा 12 के तहत उसे सेवा से अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता:
“…चूंकि अपीलकर्ता को 1958 के अधिनियम की धारा 3 के तहत लाभ प्रदान किया गया है, इसलिए वह दोषसिद्धि के कारण अपने सेवा करियर को प्रभावित करने वाली किसी भी अयोग्यता का सामना नहीं करेगा, जैसा कि 1958 के अधिनियम की धारा 12 में प्रावधानित है।”
तदनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा पूर्व में दी गई छह महीने की जेल की सजा और कुल ₹3,500 के जुर्माने को ₹5,00,000 के समेकित जुर्माने में परिवर्तित कर दिया, जिसे मृतका के परिवार को मुआवजा माना जाएगा।
न्यायालय ने विशेष रूप से यह निर्देश जारी किया:
“चूंकि अपीलकर्ता वर्तमान में बीएमटीसी की सेवा में कार्यरत है, इसलिए लगाए गए जुर्माने को रोजगार की अयोग्यता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि उसे 1958 के अधिनियम की धारा 3 और 12 के तहत लाभ प्रदान किया गया है।”
अंत में, सर्वोच्च न्यायालय ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि बैंक खाते का विवरण प्रस्तुत किए जाने के चार सप्ताह के भीतर मृतका के परिवार को जमा कराई गई राशि ब्याज सहित जारी कर दी जाए।
मामले का विवरण
- मामले का शीर्षक: महादेवन्ना डी.एम. बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य
- मामला संख्या: आपराधिक अपील संख्या 2026 [विशेष अनुमति याचिका (क्रिमिनल) संख्या 4563/2022 से उत्पन्न]
- पीठ: माननीय न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और माननीय न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर
- दिनांक: 18 मई, 2026

