इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए टिप्पणी की है कि पवित्र गंगा नदी में मांसाहारी भोजन का कचरा या अवशेष फेंकने से हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। अदालत ने यह टिप्पणी वाराणसी में गंगा नदी में एक नाव पर इफ्तार पार्टी के दौरान कथित रूप से मीट के अवशेष फेंकने के आरोपी आठ लोगों को जमानत देते हुए की।
अदालत ने आरोपियों की बिना किसी आपराधिक पृष्ठभूमि, जेल में बिताए समय और उनके द्वारा दिल से मांगी गई माफी को आधार बनाते हुए उन्हें राहत दी है।
यह घटना 15 मार्च 2026 की है, जब रमजान के दौरान वाराणसी में गंगा नदी के बीच एक नाव पर इफ्तार पार्टी का आयोजन किया गया था। आरोप है कि इस पार्टी के दौरान कुछ लोगों ने मांसाहारी भोजन किया और उसके बाद बचे हुए अवशेषों और हड्डियों को सीधे गंगा नदी में फेंक दिया।
अगले दिन, यानी 16 मार्च 2026 को भाजपा युवा मोर्चा के वाराणसी अध्यक्ष रजत जायसवाल की शिकायत पर पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज की थी। शिकायतकर्ता का आरोप था कि इस कृत्य से जानबूझकर हिंदू समाज की आस्था और पवित्र गंगा नदी का अपमान किया गया है।
इसके बाद, पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 17 मार्च 2026 को आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। उन पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की उन धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और पूजा स्थल को अपवित्र करने से संबंधित हैं।
हाई कोर्ट में अपील करने से पहले, आरोपियों ने वाराणसी की सत्र अदालत में जमानत याचिका दायर की थी। लेकिन 1 अप्रैल 2026 को सत्र न्यायालय ने यह कहते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया था कि प्रथम दृष्टया आरोपियों का इरादा सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ना प्रतीत होता है।
इसके बाद आरोपियों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया। हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान आरोपियों ने अपनी गलती पर गहरा खेद व्यक्त किया। उन्होंने अदालत को लिखित आश्वासन दिया कि वे भविष्य में कभी भी ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जिससे किसी की भावनाएं आहत हों।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला ने अपने आदेश में लिखा:
“इस इफ्तार पार्टी के दौरान मुस्लिम समुदाय के सदस्यों द्वारा मांसाहारी भोजन करने और फिर उसके अवशेषों को गंगा नदी में फेंकने का आरोप है। न्यायालय की निष्पक्ष राय में, इस कृत्य से हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचना स्वाभाविक है।”
हालांकि, अदालत ने आरोपियों के पछतावे और उनके साफ रिकॉर्ड को भी ध्यान में रखा। जस्टिस शुक्ला ने आगे कहा:
“आवेदक अपने इस कृत्य के लिए बेहद शर्मिंदा हैं और माफी मांग रहे हैं। यहां तक कि उनके परिवार भी समाज को पहुंचे इस दर्द के लिए गहरा खेद व्यक्त कर रहे हैं।”
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मामले के सभी तथ्यों, आरोपियों के बिना किसी आपराधिक इतिहास, हिरासत की अवधि (17 मार्च से जेल में बंद) और उनके द्वारा व्यक्त की गई लिखित माफी को देखते हुए, प्रथम दृष्टया जमानत का आधार बनता है।
15 मई 2026 को आए इस फैसले में हाई कोर्ट ने सभी आठ आरोपियों को रिहा करने का आदेश दिया।
जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की पीठ ने पांच आरोपियों को जमानत दी:
- मोहम्मद आज़ाद अली
- मोहम्मद तहसीम
- निहाल अफरीदी
- मोहम्मद तौसीफ अहमद
- मोहम्मद अनस
इसी मामले से जुड़े एक अन्य आदेश में जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा ने बाकी बचे तीन सह-आरोपियों को भी जमानत दे दी:
- मोहम्मद समीर
- मोहम्मद अहमद रज़ा
- मोहम्मद फैजान

