सुप्रीम कोर्ट ने देश के सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में काम करने वाले पुजारियों, ‘सेवादारों’ और अन्य कर्मचारियों के वेतन, भत्तों और सुविधाओं की समीक्षा के लिए एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति बनाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर विचार करने से साफ इनकार कर दिया है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस याचिका पर सुनवाई करने से मना करते हुए कहा कि जो लोग इस वेतन ढांचे से सीधे प्रभावित या पीड़ित हैं, उन्हें खुद अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय को सलाह दी कि वे पुजारियों के प्रशासनिक मामलों में दखल देने से बचें। कोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता को शायद पुजारियों और सेवादारों की वास्तविक कमाई का सही अंदाजा नहीं है।
इसके बाद पीठ ने उपाध्याय को याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी, साथ ही उन्हें कानून के तहत उपलब्ध अन्य कानूनी विकल्पों को तलाशने की छूट भी दी।
अधिवक्ता अश्वनी दुबे के माध्यम से दायर इस याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को एक विशेषज्ञ पैनल गठित करने का निर्देश देने की मांग की गई थी, जो मंदिर के कर्मचारियों के आर्थिक मुआवजे का मूल्यांकन कर सके।
याचिका का एक मुख्य तर्क यह था कि मंदिर के पुजारियों और कर्मचारियों को ‘वेतन संहिता, 2019’ (Code on Wages, 2019) की धारा 2(k) के तहत औपचारिक रूप से ‘कर्मचारी’ घोषित किया जाए।
याचिका में दलील दी गई थी कि जब कोई राज्य सरकार किसी मंदिर का प्रशासनिक, वित्तीय और आर्थिक नियंत्रण अपने हाथ में ले लेती है, तो वहां स्वतः ही एक नियोक्ता और कर्मचारी (Employer-Employee) का संबंध स्थापित हो जाता है। ऐसे में इन कर्मचारियों को सम्मानजनक वेतन न देना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए आजीविका के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
अश्विनी उपाध्याय ने इलाहाबाद हाई कोर्ट और अन्य उच्च न्यायालयों के पुराने फैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें सरकारी प्रबंधन वाले संस्थानों में पुजारियों के वेतन की समीक्षा करने की बात कही गई थी ताकि वे गरिमापूर्ण जीवन जी सकें।
याचिकाकर्ता ने बताया कि इस कानूनी लड़ाई को शुरू करने की मुख्य वजह उनका वाराणसी दौरा बना। 4 अप्रैल को वह एक सार्वजनिक कार्यक्रम के सिलसिले में वाराणसी गए थे। वहां प्रसिद्ध सरकारी नियंत्रण वाले काशी विश्वनाथ मंदिर में ‘रुद्राभिषेक’ करने के बाद उपाध्याय को पता चला कि वहां के पुर्याहितों और कर्मचारियों को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए जरूरी न्यूनतम वेतन भी नहीं दिया जा रहा है।
याचिका में इस स्थिति को “व्यवस्थागत शोषण” करार दिया गया था। इसमें कहा गया था कि सरकारें देवस्थानम या बंदोबस्ती विभागों (Endowments Departments) के माध्यम से मंदिरों का संचालन कर रही हैं, लेकिन वे खुद एक ‘आदर्श नियोक्ता’ की भूमिका निभाने में विफल रही हैं। अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिए तय राज्य-स्तरीय न्यूनतम वेतन से भी कम भुगतान करना न्यूनतम मजदूरी अधिनियम और नीति निदेशक तत्वों (विशेष रूप से अनुच्छेद 43) का उल्लंघन है।
इस मुद्दे की गंभीरता और तात्कालिकता को दर्शाने के लिए याचिका में दक्षिण भारतीय राज्यों में चल रहे विरोध प्रदर्शनों और हालिया नीतिगत बदलावों का भी जिक्र किया गया:
- बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन: याचिका में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों द्वारा किए गए हालिया बड़े आंदोलनों का उल्लेख किया गया था, जहाँ उन्होंने सड़क पर उतरकर न्यूनतम वेतन सुरक्षा की मांग की थी।
- महंगाई और जीवन स्तर: दलील दी गई कि 2026 के महंगाई-समायोजित जीवन यापन सूचकांक (Inflation-Adjusted Cost of Living Index) के अनुसार वेतन में बदलाव न होने के कारण मंदिर कर्मचारियों का आर्थिक स्तर लगातार गिर रहा है।
- ‘दक्षिणा’ लेने पर पाबंदी: पुजारियों की इस अनिश्चित आजीविका को तब और झटका लगा जब 7 फरवरी 2025 को तमिलनाडु के एक विभाग ने मदुरै के दंडायुधपाणि स्वामी मंदिर में एक सर्कुलर जारी किया। इस निर्देश के तहत पुजारियों को आरती की थाली में ‘दक्षिणा’ (स्वैच्छिक नकद भेंट) लेने से पूरी तरह रोक दिया गया, जिससे उनकी आय का एक पारंपरिक अतिरिक्त स्रोत बंद हो गया।
तमाम तर्कों के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने अपना रुख स्पष्ट रखा कि यदि इस मामले में कोई शिकायत या असंतोष है, तो संबंधित पक्षों को सीधे तौर पर अदालत आना चाहिए, न कि किसी तीसरे पक्ष की जनहित याचिका के माध्यम से।

