देरी से मृत्यु पंजीकरण के लिए एसडीएम का आदेश अनिवार्य; वैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार करना ‘किसी व्यक्ति के अस्तित्व को मिटाने जैसा होगा’: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वाराणसी नगर निगम के जन्म-मृत्यु रजिस्ट्रार को बिना उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) के आदेश के मृत्यु प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश देने की मांग वाली रिट याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि देरी से मृत्यु के पंजीकरण के लिए जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के तहत निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया को बाईपास नहीं किया जा सकता है। ऐसा करना कानून के उद्देश्य को ही विफल कर देगा।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता नवल किशोर श्रीवास्तव का विवाह वर्ष 1962 में माधुरी श्रीवास्तव के साथ हुआ था। याचिकाकर्ता के अनुसार, वह शादी के वर्ष 1962 में ही उन्हें छोड़कर अपने मायके बरेली चली गईं, जहां उन्होंने एक बेटे कमल किशोर श्रीवास्तव (कमल कृष्ण श्रीवास्तव) को जन्म दिया। याचिकाकर्ता ने वर्ष 1970 में तलाक का मुकदमा दायर किया जो खारिज हो गया, और 1974 में उसकी अपील भी खारिज हो गई। हालांकि वे कभी संपर्क में नहीं रहे, लेकिन अदालती आदेश के अनुपालन में याचिकाकर्ता ने 1975 से 1985 तक अपने वेतन का आधा हिस्सा उन्हें दिया।

याचिकाकर्ता 5 मई 1985 को भारतीय वायुसेना से स्क्वाड्रन लीडर के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्त हुए, जिसके बाद माधुरी श्रीवास्तव को कोई योगदान नहीं दिया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार, माधुरी श्रीवास्तव की मृत्यु 25 जनवरी 2001 को राम नगर, वाराणसी स्थित उनके मायके में हुई थी।

वर्ष 2001 में याचिकाकर्ता ने मीरा श्रीवास्तव से विवाह कर लिया। हालांकि, सेवा रिकॉर्ड में दूसरी पत्नी का नाम दर्ज नहीं हो सका और पहली पत्नी का नाम ही चलता रहा। वर्ष 2011 में याचिकाकर्ता ने पहली पत्नी का नाम हटाने और मीरा श्रीवास्तव का नाम दर्ज करने का आवेदन किया। वर्ष 2016 में 80 वर्ष की आयु प्राप्त करने पर जब उन्होंने एक फॉर्म में अपनी पत्नी का नाम मीना श्रीवास्तव (मीरा श्रीवास्तव) घोषित किया, तो वायु सेना महानिदेशालय (Directorate of Air Veterans) ने उनसे शादी का प्रमाण पत्र और पहली पत्नी की मृत्यु का प्रमाण पत्र या अदालत का तलाक का आदेश प्रस्तुत करने को कहा।

चूंकि याचिकाकर्ता का अपनी पहली पत्नी और बेटे से कोई संपर्क नहीं था, इसलिए उनके पास मृत्यु का कोई दस्तावेज नहीं था। लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल, वाराणसी से इलाज के रिकॉर्ड जुटाने और अपने बेटे से संपर्क करने के उनके हालिया प्रयास भी विफल रहे। अंततः, 17 मार्च 2025 को याचिकाकर्ता ने वार्ड नंबर 65, पुराना राम नगर के स्थानीय पार्षद से एक प्रमाण पत्र प्राप्त किया, जिसमें मृत्यु की तारीख 25 जनवरी 2001 बताई गई थी। उसी दिन उन्होंने एसडीएम सदर, वाराणसी के समक्ष एक आवेदन दिया और नगर निगम में भी आवेदन किया। नगर निगम के जोनल अधिकारी ने कुछ दस्तावेज मांगे जो याचिकाकर्ता ने उपलब्ध नहीं कराए। एसडीएम के समक्ष लंबित आवेदन के परिणाम का खुलासा किए बिना याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में वर्तमान रिट याचिका दायर की।

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पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील श्री राजेश कुमार श्रीवास्तव ने तर्क दिया कि चूंकि स्थानीय पार्षद/सभासद ने माधुरी श्रीवास्तव की मृत्यु की तिथि प्रमाणित की है, इसलिए हाईकोर्ट को रजिस्ट्रार को मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश देना चाहिए।

दूसरी ओर, नगर निगम के वकील श्री अभिषेक कुमार यादव और राज्य के सरकारी वकील ने तर्क दिया कि मृत्यु प्रमाण पत्र केवल जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 और उत्तर प्रदेश जन्म और मृत्यु पंजीकरण नियमावली, 2002 के प्रावधानों के तहत ही जारी किया जा सकता है। उन्होंने दलील दी कि एक वर्ष से अधिक की देरी से पंजीकरण के लिए संबंधित उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) का आदेश अनिवार्य है। उन्होंने बताया कि हालांकि याचिकाकर्ता ने 17 मार्च 2025 को एसडीएम से संपर्क किया था, लेकिन उसकी वर्तमान स्थिति का याचिका में खुलासा नहीं किया गया है, जिससे इसके लंबित होने का अनुमान लगाया जा सकता है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने मृत्यु पंजीकरण की वैधानिक रूपरेखा की समीक्षा की। कोर्ट ने अधिनियम, 1969 की धारा 13(3) का विश्लेषण किया, जिसके अनुसार:

“कोई भी जन्म या मृत्यु जिसका उसकी घटना के एक वर्ष के भीतर पंजीकरण नहीं किया गया है, केवल प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट या प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट द्वारा जन्म या मृत्यु की शुद्धता को सत्यापित करने के बाद और निर्धारित शुल्क के भुगतान पर किए गए आदेश पर ही पंजीकृत की जाएगी।”

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश जन्म और मृत्यु पंजीकरण नियमावली, 2002 के नियम 9(3) का भी अवलोकन किया, जिसके तहत एक वर्ष से अधिक समय बीतने पर एसडीएम का आदेश और ₹10 का विलंब शुल्क अनिवार्य है।

कोर्ट ने पाया कि नियम 9(3) के तहत एसडीएम से आदेश प्राप्त करना अनिवार्य है। चूंकि याचिकाकर्ता ने एसडीएम के समक्ष लंबित आवेदन के परिणाम का खुलासा नहीं किया, कोर्ट ने माना कि माधुरी श्रीवास्तव की मृत्यु के पंजीकरण की अनुमति देने वाला एसडीएम का कोई आदेश वर्तमान में अस्तित्व में नहीं है।

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बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि पार्षद राज कुमार यादव द्वारा जारी प्रमाण पत्र और याचिकाकर्ता का स्व-घोषणा पत्र वैधानिक रूप से महत्वहीन हैं, क्योंकि कानून के तहत केवल एसडीएम ही ऐसा आदेश पारित करने के लिए अधिकृत हैं।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि उन्हें दस्तावेज जुटाने में असुविधा हो रही है। कोर्ट ने कहा:

“याचिकाकर्ता की कोई भी असमर्थता या असुविधा वैधानिक उपाय को बायपास करने का आधार नहीं हो सकती।”

वैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार करने के गंभीर परिणामों पर जोर देते हुए हाईकोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की:

“यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि माधुरी श्रीवास्तव की मृत्यु के किसी भी साक्ष्य की अनुपस्थिति में सीधे रजिस्ट्रार को निर्देश देना किसी व्यक्ति के अस्तित्व को मिटाने के समान होगा।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने की वैधानिक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है, इसलिए यह याचिका विचारहीन (misconceived) है और इसे खारिज किया जाता है। डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता को संबंधित एसडीएम के समक्ष लंबित कार्यवाही को जारी रखने की छूट दी। मामले में कोई हर्जाना तय नहीं किया गया।

केस का विवरण:

  • केस का नाम: नवल किशोर श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 6 अन्य
  • केस नंबर: रिट सी नंबर 13812 वर्ष 2026
  • पीठ/जज: जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन
  • तारीख: 15 मई, 2026

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