तीखी बहस या ‘गलत’ आदेश पर जजों के खिलाफ नहीं चल सकती अवमानना: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक प्रैक्टिसिंग वकील द्वारा इसी कोर्ट के एक मौजूदा जज के खिलाफ दायर आपराधिक अवमानना याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वकील और पीठ के बीच होने वाली तीखी बहस कोर्ट की अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत आपराधिक अवमानना के दायरे में नहीं आती है।

जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस देवेंद्र सिंह-प्रथम की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि इस तरह की बहस न तो कोर्ट की गरिमा को ठेस पहुंचाती है और न ही न्याय प्रशासन में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न करती है। खंडपीठ ने यह भी साफ किया कि वकील के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिशों या किसी आदेश की वैधता पर अवमानना कार्यवाही के तहत विचार नहीं किया जा सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता अरुण मिश्रा, जो इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक प्रैक्टिसिंग वकील हैं, ने अवमानना आवेदन (आपराधिक) संख्या 2 वर्ष 2026 के तहत याचिका दायर की थी। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया था कि हाईकोर्ट के एक मौजूदा जज के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू कर उसे पंजीकृत किया जाए।

याचिकाकर्ता का यह मामला 26 नवंबर, 2025 को एक रिट याचिका की सुनवाई के दौरान हुई घटना से जुड़ा था, जिसमें वह याचिकाकर्ता की पैरवी कर रहे थे। वकील का आरोप था कि कुछ पूर्व की घटनाओं के कारण उन्होंने संबंधित जज से मामले को किसी अन्य कोर्ट में स्थानांतरित करने (“रिलीज़” करने) का अनुरोध किया था, क्योंकि उन्हें संबंधित जज पर भरोसा नहीं था।

वकील ने आरोप लगाया कि इसके बाद संबंधित जज ने उन्हें अपमानित किया, रिट याचिका को खारिज कर दिया और उनका नाम बार काउंसिल को भेजते हुए उनका नाम रोल से हटाने की सिफारिश कर दी। हालांकि, खंडपीठ ने पाया कि अवमानना याचिका के समर्थन में दाखिल हलफनामे में उन शब्दों या बयानों का कोई उल्लेख नहीं था जो संबंधित जज द्वारा कथित तौर पर कहे गए थे।

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अदालती कार्यवाही का रिकॉर्ड

खंडपीठ ने 26 नवंबर, 2025 को संबंधित जज द्वारा पारित मूल आदेश का बारीकी से अवलोकन किया। रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हुआ कि कोर्ट ने वकील के उस अनुरोध पर आपत्ति जताई थी जिसमें उन्होंने जज पर अविश्वास जताते हुए मामले को रिलीज करने की मांग की थी।

आदेश के अनुसार, कोर्ट ने वकील से बार-बार मामले पर बहस करने को कहा था। इसके बावजूद, वकील बहस आगे बढ़ाने के लिए तैयार नहीं थे और लगातार मामले को रिलीज करने की जिद पर अड़े रहे।

वकील के इस आचरण को देखते हुए, कोर्ट ने उनके व्यवहार की निंदा की थी और रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया था कि वह हाईकोर्ट के रोल से वकील का नाम हटाने के लिए उचित प्रक्रिया अपनाएं। इसके साथ ही, बार काउंसिल को भी आवश्यक कार्रवाई के लिए मामला भेजा गया था।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

खंडपीठ ने कहा कि कोर्ट की कार्यवाही का रिकॉर्ड (आदेश पत्रक) अंतिम होता है और इसे हलफनामे के साक्ष्यों के जरिए चुनौती नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने पाया कि 26 नवंबर, 2025 के आदेश में ऐसा कोई अपमानजनक बयान दर्ज नहीं था जैसा कि याचिकाकर्ता ने दावा किया था।

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अधिवक्ता और पीठ के बीच के गतिरोध पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“यह मानते हुए भी कि संबंधित कोर्ट और वकील के बीच कुछ तीखी बहस हुई होगी, तो भी यह कोर्ट की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) के तहत परिभाषित आपराधिक अवमानना के दायरे में नहीं आएगा। वकील और कोर्ट के बीच तीखी बहस कोर्ट की अवमानना नहीं होती है। इस तरह की तीखी बहस न तो कोर्ट को बदनाम करती है और न ही किसी कोर्ट के प्राधिकार को कम करती है, और न ही यह न्याय के प्रशासन में कोई पूर्वाग्रह पैदा करती है, हस्तक्षेप करती है या बाधा डालती है।”

गलत या प्रतिकूल न्यायिक आदेशों के खिलाफ उपलब्ध कानूनी उपचार को स्पष्ट करते हुए खंडपीठ ने कहा:

“इसी तरह, किसी कोर्ट द्वारा पारित एक गलत आदेश उसे अवमानना कार्यवाही के अधीन नहीं बनाता है, बल्कि संबंधित पक्ष उस कोर्ट के समक्ष इसे चुनौती दे सकता है जिसके पास आदेश के खिलाफ किसी भी चुनौती पर सुनवाई करने की शक्ति है।”

वकील के खिलाफ अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई के निर्देशों के संबंध में खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसी सिफारिशों को अवमानना कार्यवाही का विषय नहीं बनाया जा सकता। वकील के पास इसके खिलाफ अन्य मंचों पर कानूनी उपचार उपलब्ध हैं जिनका वह उपयोग कर सकते हैं। खंडपीठ ने जोर देकर कहा कि “अवमानना कार्यवाही के दौरान कोर्ट किसी दूसरी कोर्ट द्वारा पारित आदेश की वैधता की समीक्षा नहीं करता है।”

कोर्ट का निर्णय

खंडपीठ ने इस आपराधिक अवमानना याचिका को विचारणीय न मानते हुए खारिज कर दिया।

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खुली अदालत में फैसला सुनाए जाने के बाद, याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की अनुमति के लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 134(A) के साथ पठित अनुच्छेद 133 के तहत प्रमाण पत्र की मांग की।

खंडपीठ ने इस अनुरोध को अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया:

“हम ऐसा नहीं पाते हैं कि इस मामले में सामान्य महत्व का कोई सारवान कानूनी प्रश्न या संविधान की व्याख्या से संबंधित कोई प्रश्न शामिल है और हमारी सुविचारित राय में, इस मामले में शामिल मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्णय लिए जाने की आवश्यकता नहीं है।”

मामले का विवरण

  • मामले का शीर्षक: अरुण मिश्रा बनाम एक्स
  • मामला संख्या: अवमानना आवेदन (आपराधिक) संख्या 2 ऑफ 2026
  • पीठ: जस्टिस सलिल कुमार राय और जस्टिस देवेंद्र सिंह-प्रथम
  • दिनांक: 11 मई, 2026

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