धारा 6(5) हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम विभाजन के मुकदमे में बाधा नहीं; क्लास-I उत्तराधिकारी के रूप में बेटियों के अधिकार 2005 के संशोधन से स्वतंत्र: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 6(5) एक सीमित और सख्त अपवाद (saving clause) है। यह पूर्व में हुए वैध विभाजनों को सुरक्षा प्रदान करती है, लेकिन विभाजन के मुकदमे को दायर करने में कोई न्यायिक बाधा (jurisdictional bar) उत्पन्न नहीं करती। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 6(5) के तहत कोई वैध बंटवारा हुआ है या नहीं, यह तथ्य और कानून से जुड़ा एक ऐसा मामला है जिसकी जांच ट्रायल के दौरान होनी चाहिए और इसे शुरुआती स्तर पर ही खारिज नहीं किया जा सकता।

इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सीपीसी के आदेश VII नियम 11 के तहत वाद पत्र (plaint) खारिज करने की दूसरी अर्जी ‘रेज ज्यूडिकाटा’ (res judicata) के सिद्धांत के तहत वर्जित है, अगर उसी मुद्दे पर पहले ही फैसला आ चुका हो। कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए बेटियों के विभाजन के मुकदमे को बहाल कर दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद श्री बी.एम. सीनप्पा (मूल पुरुष) की संपत्तियों से जुड़ा है, जिनकी मृत्यु 6 मार्च 1985 को बिना वसीयत (intestate) किए हो गई थी। उनके पीछे उनकी विधवा लक्ष्मीदेवम्मा (प्रतिवादी संख्या 1), चार बेटे (बी.एस. रमेश सहित, जिनकी मृत्यु के बाद उनके कानूनी प्रतिनिधि भुवनेश्वर और वेंकटेश प्रतिवादी संख्या 1 और 2 हैं) और तीन बेटियां बी.एस. ललिता, बी.एस. वसंती और बी.एस. जयंती (अपीलकर्ता) बची थीं।

प्रतिवादियों का दावा था कि 6 सितंबर 1985 को बेटों के बीच मौखिक बंटवारा हुआ था और 1988 में बेटियों को पैसे देकर उनकी सहमति से एक पारिवारिक बंटवारा दस्तावेज (पालुपट्टी) तैयार किया गया था। बेटियों ने इन दावों को खारिज कर दिया। उनका कहना था कि 16 जून 2000 को मां और बेटों ने मिलकर गुपचुप तरीके से एक रजिस्टर्ड विभाजन विलेख (Partition Deed) तैयार किया, जिसमें संपत्तियों को केवल बेटों और मां के बीच विभाजित कर दिया गया और बेटियों को कोई हिस्सा नहीं दिया गया।

बेटियों ने 11 जुलाई 2007 को मुकदमा (O.S. No. 5352/2007) दायर कर संपत्तियों में 1/8वें हिस्से की मांग की।

जनवरी 2008 में प्रतिवादियों ने आदेश VII नियम 11(d) के तहत वाद पत्र खारिज करने की अर्जी (I.A. No. 2) दी। ट्रायल कोर्ट ने इसे स्वीकार किया, लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट ने 31 जनवरी 2013 को इस फैसले को पलट दिया और मामला वापस भेज दिया। हाईकोर्ट का मानना था कि भले ही बेटियों को कोपार्शनर (सहदायिक) का हिस्सा न मिले, लेकिन धारा 8 के तहत पिता की संपत्ति में उनका क्लास-I उत्तराधिकारी के रूप में स्वतंत्र अधिकार सुरक्षित है। यह आदेश अंतिम हो गया था।

आठ साल बाद दिसंबर 2021 में, प्रतिवादी नंबर 4 के कानूनी प्रतिनिधियों ने आदेश VII नियम 11(a), (b), और (d) के तहत वाद पत्र खारिज करने की दूसरी अर्जी (I.A. No. IV) दायर की। उन्होंने विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा के फैसले का हवाला देते हुए दावा किया कि 20 दिसंबर 2004 से पहले के बंटवारे को चुनौती नहीं दी जा सकती और यह मुकदमा कानूनन बाधित है।

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ट्रायल कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया, लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट ने 29 अगस्त 2024 को अपील मंजूर करते हुए बेटियों का वाद पत्र खारिज कर दिया। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ताओं (बेटियों) की ओर से:

  • रेज ज्यूडिकाटा: वाद पत्र खारिज करने का दूसरा आवेदन रेज ज्यूडिकाटा के सिद्धांत से बाधित है क्योंकि 2013 में हाईकोर्ट ने इसी मुद्दे को अंतिम रूप से तय कर दिया था।
  • समान हित: हाईकोर्ट का यह तर्क गलत है कि अलग-अलग प्रतिवादियों द्वारा अर्जी दायर किए जाने के कारण रेज ज्यूडिकाटा लागू नहीं होता। सभी प्रतिवादी एक ही हित के लिए लड़ रहे हैं और सीपीसी की धारा 11 के स्पष्टीकरण VI के तहत एक ही अधिकार के तहत मुकदमा लड़ रहे हैं।
  • कानून में कोई बदलाव नहीं: विनीता शर्मा के फैसले ने धारा 8 के तहत बेटियों के स्वतंत्र अधिकार को प्रभावित नहीं किया है, जो पिता की बिना वसीयत मृत्यु होने पर Class I उत्तराधिकारी के रूप में उन्हें प्राप्त होता है।
  • बचाव उपबंध बनाम न्यायिक बाधा: धारा 6(5) केवल एक बचाव उपबंध (saving clause) है, न कि मुकदमे पर कोई रोक। बेटियों की जानकारी के बिना किए गए बंटवारे की वैधता का परीक्षण ट्रायल में होना चाहिए।
  • स्वतंत्र अधिकार: 1985 में पिता की मृत्यु के बाद ही बेटियों का अधिकार बिना संशोधित अधिनियम के ही सुरक्षित हो गया था।

प्रतिवादियों की ओर से:

  • बंटवारे का संरक्षण: 16 जून 2000 का रजिस्टर्ड बंटवारा विलेख धारा 6(5) के तहत सुरक्षित है क्योंकि यह 20 दिसंबर 2004 से पहले का है।
  • कठोरता से लागू होना: विनीता शर्मा का फैसला कानून में बदलाव के समान है, जिससे 2013 का आदेश बेअसर हो जाता है।
  • अलग-अलग आवेदन: पहली अर्जी कुछ प्रतिवादियों द्वारा धारा 11(d) के तहत दायर की गई थी, जबकि दूसरी अर्जी प्रतिवादी नंबर 4 के प्रतिनिधियों द्वारा अलग-अलग धाराओं के तहत दायर की गई, इसलिए रेज ज्यूडिकाटा लागू नहीं होता।
  • विबंधन और दावे का परित्याग: बेटियों ने मौखिक बंटवारे और पालुपट्टी के जरिए अपना अधिकार छोड़ दिया था और अब वे चतुर ड्राफ्टिंग का सहारा ले रही हैं।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में मुख्य रूप से रेज ज्यूडिकाटा के सिद्धांत, धारा 6(5) की प्रकृति और धारा 8 के तहत बेटियों के स्वतंत्र अधिकारों पर विचार किया।

1. बार-बार आवेदन पर रेज ज्यूडिकाटा की रोक

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक ही मुकदमे के अलग-अलग चरणों में भी रेज ज्यूडिकाटा लागू होता है। कोर्ट ने सत्याध्यान घोषाल और अन्य बनाम देवराजिन देबी (Smt) और अन्य मामले का हवाला देते हुए टिप्पणी की:

“रेज ज्यूडीकाटा (प्राडन्याय) का सिद्धांत एक ही मुकदमे के दो चरणों के बीच भी इस सीमा तक लागू होता है कि एक अदालत, चाहे वह निचली अदालत हो या उच्च अदालत, जिसने पहले के चरण में किसी मामले का एक तरीके से फैसला कर दिया है, वह पक्षकारों को उसी कार्यवाही के बाद के चरण में उस मामले को फिर से उठाने की अनुमति नहीं देगी।”

कोर्ट ने आगे कहा कि प्रतिवादी यह कहकर रेज ज्यूडिकाटा से नहीं बच सकते कि यह आवेदन किसी अन्य प्रतिवादी के कानूनी प्रतिनिधियों द्वारा दिया गया था। सभी प्रतिवादी एक ही हित के लिए लड़ रहे हैं। सिंघई लाल चंद जैन बनाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मामले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग उप-नियमों का सहारा लेकर पूर्व के अंतिम आदेश को दरकिनार नहीं किया जा सकता:

“कोई भी पक्षकार एक अलग प्रक्रियात्मक प्रावधान के तहत उसी चुनौती को नए सिरे से पेश करके किसी प्रतिकूल आदेश की अंतिमता को दरकिनार नहीं कर सकता है। इस मुद्दे का मूल सार कि क्या हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6(5) के तहत मुकदमा बाधित होने के आधार पर वाद पत्र को खारिज किया जाना चाहिए, वही रहता है।”

विनीता शर्मा के फैसले से 2013 के आदेश का कानूनी आधार नहीं बदलता क्योंकि वह आदेश मुख्य रूप से धारा 8 के तहत बेटियों के स्वतंत्र अधिकारों पर आधारित था।

2. धारा 6(5) एक बचाव उपबंध (Saving Clause) है, न्यायिक बाधा नहीं

अधिनियम की धारा 6(5) की प्रकृति स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने गंदुरी कोटेश्वरम्मा और अन्य बनाम चाकिरी यानादी और अन्य और प्रशांत कुमार साहू और अन्य बनाम चारुलता साहू और अन्य मामलों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया:

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“धारा 6(5) अत्यंत सीमित और सख्त रूप से लागू होने वाला एक बचाव उपबंध (saving clause) है। यह विभाजन के मुकदमे को दायर करने में कोई न्यायिक बाधा उत्पन्न नहीं करता है। ‘बाधा’ (bar) और ‘बचाव उपबंध’ (saving clause) के बीच का अंतर कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है। जहां एक बाधा अदालत को मुकदमे पर विचार करने से पूरी तरह रोकती है, वहीं दूसरी ओर एक बचाव उपबंध गुण-दोष के आधार पर एक ऐसा बचाव प्रदान करता है जिसे दावा करने वाले पक्षकार द्वारा सिद्ध किया जाना चाहिए।”

बेटियों की जानकारी के बिना किए गए बंटवारे को शुरुआती स्तर पर ही सही नहीं माना जा सकता। कोर्ट का मत था:

“धारा 6(5) को शुरुआती स्तर पर ही इस जांच को बंद करने वाला मान लेना, एक रजिस्टर्ड विलेख के अस्तित्व को इस निष्कर्ष के साथ मिलाने जैसा है कि विभाजन वैध है और सभी व्यक्तियों पर बाध्यकारी है। आदेश VII नियम 11 के चरण में इस तरह का घालमेल करना सर्वथा अस्वीकार्य है।”

3. धारा 8 के तहत बेटियों का स्वतंत्र अधिकार

1985 में पिता की मृत्यु के समय लागू व्यवस्था के अनुसार, धारा 8 और तत्कालीन धारा 6 के परंतुक (proviso) के तहत बेटियों को अधिकार मिल चुका था। कोर्ट ने कहा:

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“पिता के हिस्से में बेटियों का यह अधिकार बिना संशोधित अधिनियम के तहत वर्ष 1985 में अर्जित हुआ था। यह पूरी तरह से 2005 के संशोधन से स्वतंत्र है और इससे दो दशक पहले का है।”

कोर्ट ने कहा कि धारा 6(5) के शब्द केवल धारा 6 के तहत कोपार्शनरी अधिकारों के संदर्भ में हैं, वे धारा 8 के स्वतंत्र अधिकारों को समाप्त नहीं करते:

“‘इस धारा में निहित कुछ भी नहीं’ शब्द प्रतिस्थापित धारा 6 को संदर्भित करते हैं, यानी धारा 6(1) द्वारा बेटियों को दिए गए नए सहदायिक (coparcenary) अधिकार। धारा 6(5) वर्ष 2004 से पहले के विभाजनों को उन नए सहदायिक अधिकारों के पूर्वव्यापी प्रभाव से बचाता है। यह अपनी स्पष्ट भाषा में धारा 8 के तहत क्लास-I के उत्तराधिकारियों के पहले से मौजूद अधिकारों को समाप्त करने का इरादा नहीं रखता है और न ही रख सकता है…”

मयार (एच.के.) लिमिटेड मामले का संदर्भ लेते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल वाद पत्र में किसी विशिष्ट धारा का उल्लेख न होना दावे को कमजोर नहीं करता:

“पक्षकारों के अधिकारों का निर्धारण अदालत द्वारा पेश किए गए तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि लागू किए गए वैधानिक प्रावधान के नामकरण के आधार पर।”

4. धारा 115 सीपीसी के तहत रिवीजन अधिकार क्षेत्र की सीमा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपनी निगरानी शक्तियों (supervisory powers) की सीमा का उल्लंघन किया है। ट्रायल कोर्ट का आदेश सही था और हाईकोर्ट को शुरुआती स्तर पर तथ्यों की विस्तृत समीक्षा नहीं करनी चाहिए थी।

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के 29 अगस्त 2024 के फैसले को रद्द कर दिया। ट्रायल कोर्ट के 15 नवंबर 2022 के आदेश को बहाल किया गया और विभाजन के मुकदमे (O.S. No. 5352/2007) को पुनर्जीवित कर दिया गया। संपत्तियों पर यथास्थिति (status quo) बनाए रखने का निर्देश जारी रहेगा और ट्रायल कोर्ट को तेजी से सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की गई है, और इन तथ्यों की जांच विचारण के दौरान की जाएगी।

केस का विवरण

  • केस का शीर्षक: बी.एस. ललिता और अन्य बनाम भुवनेश्वर और अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील नंबर ______ / 2026 (एसएलपी (सी) नंबर 23709 / 2024 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
  • दिनांक: 15 मई, 2026

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