इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने अदालती कार्यवाही में पारदर्शिता की कमी और तथ्यों को छिपाने (Suppression of Facts) पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने सुल्तानपुर के एक मामले की सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता पर ₹1 लाख का भारी-भरकम जुर्माना लगाया है। न्यायमूर्ति बृज राज सिंह ने बुधवार को यह आदेश जारी करते हुए याचिका को खारिज कर दिया।
यह मामला सुल्तानपुर की रहने वाली चंद्रमा देवी अग्रहरी से जुड़ा है। उन्होंने हाई कोर्ट में एक याचिका दायर कर सुल्तानपुर की एसीजेएम (ACJM) कोर्ट द्वारा जारी किए गए समन आदेश को चुनौती दी थी।
सुनवाई के दौरान अदालत को पता चला कि याचिकाकर्ता ने इसी समन आदेश के खिलाफ पहले से ही सुल्तानपुर के सत्र न्यायालय (Sessions Court) में एक ‘क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन’ दाखिल कर रखी थी। हाई कोर्ट में नई याचिका दायर करते समय उन्होंने इस महत्वपूर्ण कानूनी तथ्य को जानबूझकर छिपाया।
न्यायमूर्ति सिंह ने इस ‘दोहरी चाल’ और न्यायिक समय की बर्बादी पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता ने अदालत से सच्चाई छिपाकर राहत पाने की कोशिश की। इसके दंड स्वरूप ₹1 लाख का जुर्माना लगाया गया, जिसका भुगतान इस प्रकार किया जाएगा:
- ₹30,000: मूल शिकायतकर्ता को दिए जाएंगे, ताकि उसे हुई परेशानी की भरपाई हो सके।
- ₹70,000: राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण (State Legal Services Authority) में जमा कराने होंगे।
यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो एक ही राहत के लिए अलग-अलग अदालतों में समानांतर कार्यवाही शुरू करते हैं। भारतीय कानून के ‘क्लीन हैंड्स’ सिद्धांत के अनुसार, जब भी कोई व्यक्ति उच्च न्यायालय से राहत मांगता है, तो उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह सभी तथ्यों को पूरी ईमानदारी के साथ सामने रखे।
सच्चाई छिपाने या गुमराह करने वाली याचिकाओं से न केवल अदालतों पर बोझ बढ़ता है, बल्कि यह न्याय की प्रक्रिया के साथ भी खिलवाड़ है।

