सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण मुआवजे से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाया है कि यदि कोई मध्यस्थ (Arbitrator) मुआवजे का निर्धारण करने के लिए किसी ऐसी जमीन के इकलौते ‘सेल डीड’ (बिक्री विलेख) पर भरोसा करता है जो अधिग्रहित जमीन से पूरी तरह अलग है, तो इसे ‘पेटेंट इलीगैलिटी’ (स्पष्ट अवैधता) माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना ‘भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013’ (2013 अधिनियम) की धारा 26 के वैधानिक जनादेश के खिलाफ है।
कानूनी विवाद
इस मामले में मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या एक मध्यस्थ, औद्योगिक उपयोग वाली जमीन के मुआवजे को बढ़ाने के लिए पास के गांव के एक छोटे आवासीय भूखंड के एकल सेल डीड को आधार बना सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2013 अधिनियम की धारा 26(1)(b) के तहत “समान प्रकार” (similar type) की जमीनों के कई बिक्री दस्तावेजों का उपयोग करना अनिवार्य है।
मामले की पृष्ठभूमि
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने नागपुर जिले के मौजा पारदी (रिथी) में नेशनल हाईवे नंबर 547-E को चौड़ा करने के लिए 1,394 वर्ग मीटर जमीन का अधिग्रहण किया था। सक्षम प्राधिकारी ने शुरुआत में इस जमीन को कृषि श्रेणी में मानते हुए ₹161.63 प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजा तय किया था।
जमीन मालिक, अल्फ़ा रेमिडिस लिमिटेड (प्रतिवादी संख्या 1) ने मध्यस्थ के समक्ष दावा किया कि उनकी जमीन का उपयोग औद्योगिक उद्देश्य (पैरासिटामोल उत्पादन इकाई) के लिए किया जा रहा था। मध्यस्थ ने उनकी दलील स्वीकार करते हुए और पास के गांव के एक आवासीय भूखंड के 2017 के सेल डीड के आधार पर मुआवजे को बढ़ाकर ₹3,588 प्रति वर्ग मीटर कर दिया। जिला न्यायाधीश ने इस आदेश को रद्द कर दिया था, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने मध्यस्थ के फैसले को बहाल कर दिया, जिसके खिलाफ NHAI ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
NHAI की ओर से तर्क दिया गया कि मुआवजे में यह वृद्धि 2013 अधिनियम की धारा 26(1) के प्रावधानों के विपरीत है। उनका कहना था कि एक आवासीय भूखंड के रेट को औद्योगिक जमीन के मूल्यांकन का आधार नहीं बनाया जा सकता, और केवल एक ट्रांजैक्शन “औसत बिक्री मूल्य” (average sale price) निर्धारित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
वहीं, जमीन मालिक का तर्क था कि चूंकि उनकी जमीन गैर-कृषि और औद्योगिक थी, इसलिए मध्यस्थ ने पास के गांव के गैर-कृषि सेल डीड को आधार बनाकर सही किया। उन्होंने तर्क दिया कि उस सेल डीड की सत्यता पर कोई सवाल नहीं उठाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि नेशनल हाईवे एक्ट के तहत मुआवजा तय करते समय 2013 अधिनियम की धारा 26 से 28 के प्रावधानों का पालन करना अनिवार्य है। कोर्ट ने मध्यस्थ की कार्यप्रणाली में दो बड़ी खामियां पाईं:
1. जमीन के प्रकार में असमानता: कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थ ने औद्योगिक जमीन की कीमत आंकने के लिए आवासीय भूखंड का सहारा लिया, जो कानूनी रूप से गलत है। बेंच ने टिप्पणी की:
“स्पष्ट रूप से, 2013 के अधिनियम की धारा 26(1)(b) के प्रयोजनों के लिए दोनों जमीनें ‘समान प्रकार’ की नहीं थीं और उक्त सेल डीड में दी गई दर को नहीं अपनाया जा सकता था।”
2. केवल एक उदाहरण पर निर्भरता: कोर्ट ने जोर दिया कि कानून के अनुसार “औसत बिक्री मूल्य” निकालने के लिए कई बिक्री दस्तावेजों का होना आवश्यक है। मध्य प्रदेश रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन बनाम विंसेंट डेनियल और अन्य (2025) मामले का हवाला देते हुए बेंच ने कहा:
“…इस्तेमाल की गई भाषा का तात्पर्य है कि संदर्भ के लिए कई दस्तावेज उपलब्ध होने चाहिए, क्योंकि एकल सौदे पर्याप्त और विश्वसनीय डेटा प्रदान नहीं कर सकते हैं।”
कोर्ट ने यह भी पाया कि मध्यस्थ ने जमीन मालिक द्वारा ही प्रस्तुत सरकारी ‘रेडी रेकनर’ रेट (₹2,020 प्रति वर्ग मीटर) को नजरअंदाज कर दिया, जिसे धारा 26(1)(a) के तहत आधार बनाया जाना चाहिए था।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मध्यस्थ का फैसला ‘आर्बिट्रेशन एक्ट’ की धारा 34(2A) के तहत स्पष्ट अवैधता से ग्रस्त है।
“मध्यस्थ ने 2013 के अधिनियम की धारा 26(1)(b) के निर्देशों और उसके स्पष्टीकरणों की पूरी तरह से अनदेखी की है। वैधानिक जनादेश के विपरीत, पूरी तरह से अलग प्रकार की जमीन के केवल एक सेल डीड को आधार बनाया गया।”
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए व्यवस्था दी कि जमीन मालिक ₹3,588 के बजाय ₹2,020 प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजा पाने का हकदार है। इसके साथ ही, जमीन मालिक को 2013 अधिनियम के तहत सभी परिणामी वैधानिक लाभ भी मिलेंगे।
केस विवरण
- केस शीर्षक: प्रोजेक्ट डायरेक्टर, नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया बनाम अल्फ़ा रेमिडिस लिमिटेड और अन्य
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या ___ / 2026 (SLP (C) No. 33773/2025 से उत्पन्न)
- पीठ: जस्टिस संजय कुमार, जस्टिस के. विनोद चंद्रन
- दिनांक: 12 मई, 2026

