बेनामी कानून की बाधा छिपाने के लिए “चतुराईपूर्ण ड्राफ्टिंग” की गई हो तो “पर्दा हटाना” अदालतों का कर्तव्य: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट किया है कि बेनामी संपत्ति लेनदेन (निषेध) अधिनियम, 1988 में 2016 के संशोधनों के तहत संपत्ति की जब्ती (Confiscation) से जुड़ी प्रक्रियाएं पिछली तारीख (Retrospective) से लागू होंगी। कर्नाटक हाईकोर्ट के एक फैसले को पलटते हुए, शीर्ष अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बहाल कर दिया जिसमें उस व्यक्ति के दावे (Plaint) को खारिज कर दिया गया था, जिस पर संपत्ति के मालिक की हत्या का आरोप है। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का यह दायित्व है कि वह “चतुराईपूर्ण ड्राफ्टिंग” (Clever Drafting) का पर्दा हटाकर मामले की असलियत देखे और बेनामी कानून के तहत कानूनी बाधाओं को पहचानकर शुरुआती स्तर पर ही ऐसे मुकदमों को खारिज करे। कोर्ट ने यह भी कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 25 के तहत एक हत्यारा मृतक की संपत्ति का उत्तराधिकारी नहीं हो सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

मंजुला और अन्य बनाम डी.ए. श्रीनिवास के इस मामले में, उत्तरदाता (वादी) डी.ए. श्रीनिवास ने स्वर्गीय के. रघुनाथ द्वारा 20 अप्रैल 2018 को निष्पादित एक वसीयत (Will) के आधार पर कृषि भूमि के मालिकाना हक का दावा करते हुए मुकदमा दायर किया था।

वादी ने अपनी दलीलों में यह स्वीकार किया था कि इन संपत्तियों की खरीद के लिए धन उन्होंने ही दिया था, क्योंकि कर्नाटक भूमि सुधार अधिनियम के तहत वह सीधे कृषि भूमि खरीदने के लिए कानूनी रूप से पात्र नहीं थे। अपीलकर्ताओं (प्रतिवादियों)—जो रघुनाथ की विधवा और बच्चे हैं—ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VII नियम 11 के तहत वादी के दावे को खारिज करने की मांग की थी। उनकी दलील थी कि यह मुकदमा बेनामी लेनदेन को छिपाने के लिए रचा गया एक “स्वांग” है और वादी रघुनाथ की हत्या का मुख्य आरोपी होने के नाते उनकी संपत्ति पाने का हकदार नहीं है।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं (प्रतिवादियों) की ओर से: वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि यदि याचिका को “सार्थक रूप से पढ़ा” (Meaningful Reading) जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि यह एक प्रतिबंधित बेनामी लेनदेन है। उन्होंने कहा कि वादी का यह स्वीकार करना कि उसने कानून से बचने के लिए दूसरे के नाम पर पैसे देकर संपत्ति खरीदी, बेनामी अधिनियम की धारा 4 के तहत कानूनी बाधा उत्पन्न करता है। उन्होंने वसीयतकर्ता की हत्या के मामले में वादी के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही का भी हवाला दिया।

उत्तरदाता (वादी) की ओर से: वादी ने तर्क दिया कि उनका मुकदमा एक वैध वसीयत पर आधारित है और यह लेनदेन वादी और मृतक (जो एक कर्मचारी था) के बीच “विश्वासपूर्ण संबंध” (Fiduciary Relationship) के तहत सुरक्षित था। उन्होंने कहा कि कोई लेनदेन बेनामी है या नहीं, यह तथ्य और कानून का मिला-जुला प्रश्न है जिसे ट्रायल के दौरान ही तय किया जा सकता है, और हत्या के आरोपों का सिविल मुकदमे की स्थिरता पर शुरुआती स्तर पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष साझा किए:

1. 2016 के बेनामी संशोधनों का पिछली तारीख से लागू होना: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हालांकि दंडात्मक प्रावधान भविष्य के लेनदेन पर लागू होते हैं, लेकिन संपत्ति की जांच और जब्ती से जुड़ी प्रक्रियाएं पुराने लेनदेन पर भी लागू होंगी।

“हम यह मानते हैं कि 2016 के संशोधन, जहां तक वे घोषणात्मक, प्रक्रियात्मक और उपचारात्मक हैं, पिछली तारीख (Retrospective) से लागू होंगे, जबकि नए अपराध या सजा बढ़ाने वाले दंडात्मक प्रावधान केवल भविष्य के मामलों पर लागू होंगे।”

2. उत्तराधिकार से हत्यारे की अयोग्यता: कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 25 और इस न्यायसंगत सिद्धांत का हवाला दिया कि “कोई भी व्यक्ति अपने स्वयं के अपराध का लाभ नहीं उठा सकता” (nullus commodum capere potest de injuria sua propria)।

“जिस व्यक्ति पर उस व्यक्ति की हत्या का आरोप है जिससे उत्तराधिकार का दावा किया जा रहा है, वह उत्तराधिकार का अधिकार खो देता है। इसके लिए सिविल कार्यवाही में आपराधिक मामले जैसे कड़े सबूतों की अनिवार्यता नहीं है, यदि संभावनाओं की अधिकता (Preponderance of Probabilities) अपराध की ओर इशारा करती है।”

3. “चतुराईपूर्ण ड्राफ्टिंग” का पर्दा हटाने का कर्तव्य: कोर्ट ने दोहराया कि अदालतों को फर्जी मुकदमों की पहचान करने के लिए याचिका के स्वरूप से परे जाकर उसकी सच्चाई देखनी चाहिए।

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“यदि चतुराईपूर्ण ड्राफ्टिंग के जरिए मुकदमे का आधार होने का भ्रम पैदा किया गया है, तो कोर्ट का यह कर्तव्य है कि वह पर्दा हटाए और शुरुआती स्तर पर ही मुकदमे को खारिज करे।”

4. विश्वासपूर्ण संबंध (Fiduciary Capacity) के दावे को खारिज करना: कोर्ट ने कहा कि मालिक और कर्मचारी का रिश्ता बेनामी अधिनियम के तहत कानूनी छूट पाने के लिए “विश्वासपूर्ण संबंध” की श्रेणी में नहीं आता। कोर्ट ने यह भी पाया कि यह व्यवस्था कर्नाटक भूमि सुधार अधिनियम को चकमा देने के लिए की गई थी, जिससे यह अनुबंध अधिनियम की धारा 23 के तहत गैरकानूनी उद्देश्य वाला करार बन जाता है।

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फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार की और हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने पाया कि वादी का दावा पूरी तरह से एक अवैध बेनामी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है।

अंतिम निर्देश:

  1. कर्नाटक हाईकोर्ट का निर्णय रद्द किया जाता है और ट्रायल कोर्ट द्वारा वादी के दावे को खारिज करने का आदेश बहाल किया जाता है।
  2. केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाता है कि वह आठ सप्ताह के भीतर एक प्रशासक नियुक्त कर विवादित संपत्तियों को अपने कब्जे में ले, क्योंकि वे बेनामी अधिनियम की धारा 27 के तहत जब्त किए जाने योग्य हैं।
  3. कोर्ट ने निर्देश दिया कि चूंकि इस लेनदेन को न्यायिक रूप से बेनामी घोषित कर दिया गया है, इसलिए अब कोई भी अदालत इन संपत्तियों के संबंध में किसी दावे पर विचार नहीं करेगी।

केस विवरण

  • केस टाइटल: मंजुला और अन्य बनाम डी.ए. श्रीनिवास
  • केस नंबर: सिविल अपील नंबर 7370 / 2026
  • पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन
  • तारीख: 8 मई, 2026

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