सोशल मीडिया पर ‘लक्ष्मण रेखा’ लांघना पड़ेगा भारी: पीएम मोदी और RSS के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के खिलाफ सोशल मीडिया पर “देशद्रोही” और “आपत्तिजनक” पोस्ट करने वाले दो युवकों को राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। कोर्ट ने उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग समाज में वैमनस्य फैला सकता है।

यह मामला सोनभद्र निवासी जुबैर अंसारी और इजहार आलम से जुड़ा है, जिन पर फेसबुक के जरिए पीएम मोदी और आरएसएस को निशाना बनाने का आरोप है।

जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए आरएसएस और प्रधानमंत्री के पद की गरिमा पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि आरएसएस एक ऐसा संगठन है जो पिछले 100 वर्षों से समाज के विभिन्न वर्गों की सेवा में लगा हुआ है। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में अदालत ने स्पष्ट किया कि उन्हें देश के नागरिकों के बहुमत ने लोकतांत्रिक तरीके से चुना है।

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अदालत ने माना कि आरोपियों द्वारा किए गए फेसबुक पोस्ट धार्मिक भावनाओं को भड़काने और सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने का एक “जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण प्रयास” थे।

डिजिटल युग में सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए जस्टिस श्रीवास्तव ने इसे एक ‘दोधारी तलवार’ बताया। कोर्ट ने कहा, “आज के दौर में लोगों के लिए अपनी राय साझा करना बहुत आसान हो गया है, जो एक अच्छी बात है। लेकिन कभी-कभी लोग बिना परिणामों को समझे मर्यादाओं को पार कर जाते हैं।”

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अदालत ने दुष्प्रचार के खतरों को समझाने के लिए साल 2012 की एक घटना का उदाहरण दिया। उस समय भूकंप पीड़ितों की छेड़छाड़ की गई (morphed) तस्वीरों को असम और बर्मा के दंगों का शिकार बताकर वायरल किया गया था, जिसका उद्देश्य हिंसा भड़काना था। इसके अलावा, अदालत ने इंटरनेट पर नाबालिगों की पोर्नोग्राफिक कंटेंट तक आसान पहुंच को लेकर भी चेतावनी दी।

दोनों आरोपी भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196(1)(a) के तहत आरोपों का सामना कर रहे हैं। यह धारा उन मामलों में लागू होती है जहाँ कोई सामग्री जानबूझकर धर्म, जाति, जन्म स्थान या समुदाय के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच नफरत या शत्रुता को बढ़ावा देती है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सद्भाव बिगाड़ने वाले पोस्ट ‘संज्ञेय अपराध’ (Cognizable Offence) की श्रेणी में आते हैं, जिसमें पुलिस को सीधे FIR दर्ज करने और बिना वारंट गिरफ्तारी का अधिकार होता है।

बचाव पक्ष के वकीलों ने तर्क दिया था कि यह FIR केवल उत्पीड़न की मंशा से दर्ज की गई है। हालांकि, राज्य सरकार के वकील ने दलील दी कि मामले की गंभीरता को देखते हुए ट्रायल चलना अनिवार्य है। साक्ष्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपियों के खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता। इसी के साथ अदालत ने ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही को जारी रखने का आदेश दिया।

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