सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी ‘कोलाबोरेटर’ (सहयोगी) की भूमिका ठेकेदार को तकनीकी रूप से योग्य बनाने के लिए अनिवार्य थी, तो वह मध्यस्थता समझौते का एक ‘वास्तविक पक्ष’ (veritable party) माना जाएगा। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ‘प्रिविटी ऑफ कॉन्ट्रैक्ट’ (अनुबंधात्मक संबंध) की कमी का हवाला देते हुए मध्यस्थ की नियुक्ति से इनकार कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि ‘डीड ऑफ जॉइंट अंडरटेकिंग’ (DJU) और त्रिपक्षीय समझौतों के माध्यम से पक्षों के बीच अटूट संबंध स्थापित होता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद नबीनगर थर्मल पावर प्रोजेक्ट के लिए ‘कोल हैंडलिंग प्लांट पैकेज’ स्थापित करने के अनुबंध से जुड़ा है। ठेकेदार (रेस्पोंडेंट नंबर 2) ने योग्यता मानदंडों को पूरा करने के लिए अपीलकर्ता (एलीकॉन इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड) के साथ कोलाबोरेट किया था। बिड की शर्त के अनुसार, दोनों पक्षों ने 22 फरवरी 2010 को एम्प्लॉयर (भारतीय रेल बिजली कंपनी लिमिटेड) के पक्ष में एक ‘डीड ऑफ जॉइंट अंडरटेकिंग’ (DJU) जमा की थी।
प्रोजेक्ट के निष्पादन के दौरान, ठेकेदार कंपनी लिक्विडेशन (समापन) की प्रक्रिया में चली गई। इसके बाद, एम्प्लॉयर ने कोलाबोरेटर को DJU के अनुसार अनुबंध के सफल प्रदर्शन की पूरी जिम्मेदारी लेने के लिए कहा। 5 अप्रैल 2016 को एक त्रिपक्षीय समझौता भी हुआ, जिसमें कोलाबोरेटर को सीधे भुगतान करने की अनुमति दी गई। बाद में जब बकाया भुगतान और बैंक गारंटी के इनकैशमेंट को लेकर विवाद हुआ, तो कोलाबोरेटर ने मध्यस्थता की मांग की। हाईकोर्ट ने इस आधार पर याचिका खारिज कर दी थी कि कोलाबोरेटर अनुबंध का हस्ताक्षरकर्ता नहीं था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (कोलाबोरेटर): वरिष्ठ अधिवक्ता श्री श्रीधर पोटाराजू ने तर्क दिया कि कोलाबोरेटर के बिना ठेकेदार बिड की पात्रता शर्तों को पूरा ही नहीं कर पाता। उन्होंने जोर देकर कहा कि एम्प्लॉयर ने खुद पत्राचार के माध्यम से कोलाबोरेटर को “जोखिम और लागत” (risk and cost) पर काम पूरा करने की चेतावनी दी थी, जो साबित करता है कि कोलाबोरेटर अनुबंध का अभिन्न अंग था।
रेस्पोंडेंट (एम्प्लॉयर): वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अमन लेखी ने दलील दी कि धारा 21 के तहत दिए गए नोटिस में कोलाबोरेटर ने मध्यस्थता के लिए “सहमति” मांगी थी, जिससे पता चलता है कि वे खुद मानते थे कि कोई पूर्व मध्यस्थता क्लॉज मौजूद नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि त्रिपक्षीय समझौते के बाद पुराने अनुबंध निष्प्रभावी हो गए थे।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निष्कर्षों को खारिज करते हुए कहा कि बिड दस्तावेजों में तकनीकी योग्यता के लिए DJU अनिवार्य था। पीठ ने टिप्पणी की कि DJU स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि कोलाबोरेटर अनुबंध और उसके क्रियान्वयन का एक “अविभाज्य हिस्सा” था।
कोर्ट ने ‘प्रिविटी ऑफ कॉन्ट्रैक्ट’ के मुद्दे पर स्पष्ट किया कि जब ठेकेदार डिफॉल्टर हुआ, तो एम्प्लॉयर ने खुद DJU के तहत कोलाबोरेटर के दायित्वों की पुष्टि की थी। पीठ ने कहा:
“कोलाबोरेटर द्वारा 02.07.2022 के पत्र में मांगी गई सहमति दिल्ली इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर को मामला भेजने के लिए थी, न कि मध्यस्थता के माध्यम से विवाद सुलझाने के लिए सहमति; जिसका प्रावधान पहले से ही उस अनुबंध में उपलब्ध था जिसका कोलाबोरेटर एक अनिवार्य और अटूट हिस्सा है।”
कोर्ट ने माना कि DJU और त्रिपक्षीय समझौते द्वारा स्थापित ‘संयुक्त और व्यक्तिगत’ (joint and several) जिम्मेदारी कोलाबोरेटर को अनुबंध का एक ‘वास्तविक पक्ष’ बनाती है। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा:
“त्रिपक्षीय समझौते ने केवल अनुबंध को पूरा करने के लिए कोलाबोरेटर की जिम्मेदारी की पुष्टि की थी… यह ठेकेदार की अक्षमता के मद्देनजर कोलाबोरेटर को सीधे भुगतान सुनिश्चित करने का एक उपाय था और यह पिछले अनुबंध को खत्म नहीं करता है।”
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को दरकिनार करते हुए आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलीएशन एक्ट, 1996 की धारा 11(6) के तहत याचिका स्वीकार कर ली। कोर्ट ने उड़ीसा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस (रिटायर्ड) चक्रधारी शरण सिंह को विवाद के निपटारे के लिए एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया है।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि मध्यस्थ कानून के अनुसार कार्यवाही आगे बढ़ाएंगे और निर्णय की प्रति प्राप्त होने के 15 दिनों के भीतर धारा 12 के तहत घोषणा करेंगे।
केस विवरण
- केस टाइटल: एलीकॉन इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड बनाम भारतीय रेल बिजली कंपनी लिमिटेड और अन्य
- केस नंबर: सिविल अपील नंबर (2026 की) (@ SLP (C) No. 33128 of 2025)
- पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
- दिनांक: 07 मई, 2026

