इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक जेल अपील पर सुनवाई करते हुए हत्या (धारा 302 IPC) के दोषी की सजा को ‘गैर-इरादतन हत्या’ (धारा 304 पार्ट II IPC) में तब्दील कर दिया है। जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस जफीर अहमद की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि चूंकि यह घटना बिना किसी पूर्व योजना के, अचानक हुए झगड़े के दौरान ‘आवेश’ (heat of passion) में हुई थी, इसलिए यह मामला IPC की धारा 300 के अपवाद 4 (Exception 4) के तहत आता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला 27 मार्च 2009 का है, जो प्रतापगढ़ जिले से संबंधित है। वादी राम बोध यादव (PW-1) ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उनकी बेटी सुनीता की उसके पति देव बहादुर उर्फ मटरू यादव (अपीलकर्ता) ने सुबह करीब 6:00 बजे कुल्हाड़ी से मारकर हत्या कर दी है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, अपीलकर्ता नशे का आदी था और अक्सर अपनी पत्नी के साथ मारपीट करता था।
निचली अदालत (अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, प्रतापगढ़) ने 27 अक्टूबर 2010 को अपीलकर्ता को धारा 302 IPC के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। यह सजा मुख्य रूप से मृतक की 12 वर्षीय बेटी शालू (PW-2) की गवाही पर आधारित थी, जिसने दावा किया था कि उसने अपने पिता को मां पर हमला करते हुए देखा था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील (एमिकस क्यूरी) ने तर्क दिया कि अभियोजन की कहानी विरोधाभासों से भरी है और FIR ‘एंटी-टाईम’ (समय से पहले दर्ज दिखाई गई) प्रतीत होती है। उन्होंने कहा कि चश्मदीद गवाह शालू का नाम FIR में नहीं था और उसका बयान भी काफी देरी से दर्ज किया गया। बचाव पक्ष का मुख्य तर्क यह था कि यह घटना पति-पत्नी के बीच अचानक हुए झगड़े का परिणाम थी, जिसमें कोई पूर्व योजना नहीं थी, अतः यह मामला धारा 300 के अपवाद 4 के दायरे में आता है।
वहीं, राज्य की ओर से एजीए (AGA) ने दलील दी कि बाल गवाह शालू की गवाही पूरी तरह विश्वसनीय है। उन्होंने कहा कि शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर जिस तरह से चोटें पहुंचाई गईं, वह आरोपी के जान लेने के इरादे को स्पष्ट करती हैं, इसलिए हत्या की सजा बरकरार रहनी चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए माना कि शालू एक स्वाभाविक गवाह थी और उसकी गवाही की पुष्टि मेडिकल रिपोर्ट से भी होती है। हालांकि, कोर्ट ने FIR दर्ज करने के समय और तरीके पर संदेह व्यक्त किया। अपराध की प्रकृति पर टिप्पणी करते हुए बेंच ने कहा:
“यह घटना घर के अंदर हुई और एक झगड़े से उपजी थी। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है जो किसी पूर्व योजना या साजिश की ओर इशारा करे। ऐसा प्रतीत होता है कि अपराध में इस्तेमाल किया गया हथियार मौके पर ही अचानक उठाया गया था।”
कोर्ट ने सुरिंदर कुमार बनाम केंद्र शासित प्रदेश (1989), पुंडलिक बनाम महाराष्ट्र राज्य (2010), और रणबीर बनाम राज्य (NCT दिल्ली) (2019) जैसे महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपवाद 4 की चारों शर्तें यहां लागू होती हैं: घटना अचानक हुई, कोई पूर्व योजना नहीं थी, कार्य जुनून के आवेश में किया गया था, और अपराधी ने कोई अनुचित लाभ नहीं उठाया या क्रूर तरीके से कार्य नहीं किया।
बेंच ने आगे कहा:
“मेडिकल साक्ष्य इस तरह के अत्यधिक या बर्बर हमले का संकेत नहीं देते जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि आरोपी ने क्रूर या असामान्य व्यवहार किया या अनुचित लाभ उठाया। यह कृत्य अचानक हुए झगड़े के बाद आवेश में किया गया प्रतीत होता है।”
न्यायालय का निर्णय
हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता की सजा को धारा 302 IPC से बदलकर धारा 304 पार्ट II IPC कर दिया। कोर्ट ने गौर किया कि अपीलकर्ता 16 दिसंबर 2025 तक 18 साल, 7 महीने और 11 दिन की जेल काट चुका है, जो धारा 304 पार्ट II के तहत निर्धारित अधिकतम 10 साल की सजा से कहीं अधिक है।
अदालत ने आरोपी की तत्काल रिहाई का आदेश देते हुए कहा:
“अपीलकर्ता द्वारा पहले से काटी गई जेल की अवधि को ही इस अपराध के लिए पर्याप्त सजा माना जाता है। यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।”
केस विवरण
केस टाइटल: देव बहादुर यादव @ मटरू यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
केस नंबर: जेल अपील संख्या – 212/2011
बेंच: जस्टिस रजनीश कुमार और जस्टिस जफीर अहमद
तारीख: 4 मई, 2026

