सुप्रीम कोर्ट: 6 साल तक के बच्चों के लिए ही नया आधार कार्ड जारी करने के प्रस्ताव पर कानून में संशोधन जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को टिप्पणी की कि 6 साल तक के बच्चों तक ही नए आधार कार्ड जारी करने को सीमित करने के प्रस्ताव के लिए विधायी हस्तक्षेप (legislative intervention) की आवश्यकता होगी। चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमालया बागची की बेंच ने जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए कहा कि मौजूदा कानूनी ढांचे में उचित संशोधन करना संसद और केंद्र सरकार का काम है, न्यायपालिका का नहीं।

यह मामला वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर एक जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) को यह निर्देश देने की मांग की थी कि वह वयस्कों और किशोरों के लिए नए आधार कार्ड जारी करना बंद करे और नए नामांकन केवल 6 साल से कम उम्र के बच्चों तक ही सीमित रखे।

याचिका में तर्क दिया गया कि अब तक 144 करोड़ आधार कार्ड जारी किए जा चुके हैं, जो भारतीय आबादी के लगभग 99 प्रतिशत हिस्से को कवर करते हैं। ऐसे में अब आधार प्रणाली के दुरुपयोग को रोकने के लिए नियमों को सख्त करने की जरूरत है।

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याचिकाकर्ता ने इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की कि “घुसपैठिए” भारतीय नागरिक बनकर बड़ी आसानी से आधार कार्ड बनवा रहे हैं। याचिका में कहा गया कि वर्तमान सत्यापन प्रक्रिया “कमजोर है और इसमें आसानी से हेरफेर किया जा सकता है।” किराए के समझौते जैसे साधारण दस्तावेजों के आधार पर भी 12 अंकों का विशिष्ट पहचान नंबर प्राप्त किया जा रहा है।

याचिका में कहा गया, “विदेशी नागरिक ‘विदेशी’ श्रेणी के तहत आधार के लिए आवेदन करते हैं, लेकिन घुसपैठिए ‘भारतीय नागरिक’ की श्रेणी में आवेदन कर इसे आसानी से बनवा लेते हैं।” इसके आगे बताया गया कि एक बार आधार मिल जाने के बाद, यह एक “बुनियादी दस्तावेज” बन जाता है जिसके आधार पर राशन कार्ड, निवास प्रमाण पत्र और मतदाता पहचान पत्र बनवा लिए जाते हैं, जिससे घुसपैठियों और भारतीय नागरिकों के बीच फर्क करना असंभव हो जाता है।

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आयु सीमा के अलावा, याचिका में कई अन्य मांगें भी की गई थीं:

  • सख्त दिशा-निर्देश: नामांकन चाहने वाले किशोरों या वयस्कों के लिए कठोर सत्यापन प्रोटोकॉल तैयार करना।
  • दर्जे का स्पष्टीकरण: कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) पर यह बोर्ड लगाना अनिवार्य हो कि आधार केवल “पहचान का प्रमाण” है और यह नागरिकता, पते या जन्म तिथि का प्रमाण नहीं है।
  • कानूनी समीक्षा: याचिका में यह सवाल भी उठाया गया कि क्या आधार अधिनियम, 2016 अब “अप्रासंगिक” (temporally unreasonable) हो गया है, क्योंकि यह विदेशियों और नागरिकों के बीच प्रभावी ढंग से अंतर करने में विफल रहा है, जिससे सार्वजनिक कल्याण संसाधनों का गलत इस्तेमाल हो रहा है।

बेंच ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका अपनी मर्जी से UIDAI को नियंत्रित करने वाले मौजूदा कानूनी ढांचे को नहीं बदल सकती।

बेंच ने कहा, “जैसा कि मांगों की प्रकृति से देखा जा सकता है, इनमें से अधिकांश के लिए विधायी हस्तक्षेप और मौजूदा कानूनी ढांचे में उचित संशोधन की आवश्यकता है।”

याचिकाकर्ता को संबोधित करते हुए कोर्ट ने सुझाव दिया कि इन शिकायतों के लिए सही मंच कार्यपालिका और विधायिका हैं। बेंच ने कहा, “इन मुद्दों को संसद और सरकार के सामने उठाएं। वे इस पर ध्यान देंगे।” कोर्ट ने आगे कहा कि केंद्र सरकार ऐसे प्रतिवेदनों (representations) पर “उचित कदम” उठाएगी।

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याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया कि यह मुकदमा “प्रतिद्वंद्विता” (adversarial) के लिए नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संसाधनों की सुरक्षा के लिए था। हालांकि, कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त किए बिना याचिका का निपटारा कर दिया।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस जनहित याचिका को केंद्र सरकार और UIDAI के समक्ष एक औपचारिक प्रतिवेदन के रूप में माना जाए। इस मामले में गृह मंत्रालय, विधि एवं न्याय मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के साथ-साथ सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी पक्षकार बनाया गया था।

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