ट्रांसजेंडर व्यक्ति संशोधन अधिनियम 2026 की संवैधानिक वैधता की जांच करेगा सुप्रीम कोर्ट; केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 की कानूनी वैधता की समीक्षा करने का निर्णय लिया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्या कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने इस नए कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार के साथ-साथ सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने कानून के क्रियान्वयन पर रोक लगाने की मांग की थी, जिसे अदालत ने फिलहाल स्वीकार नहीं किया। बेंच ने स्पष्ट रूप से कहा, “किसी भी अंतरिम आदेश को पारित करने का सवाल ही नहीं उठता।”

यह कानूनी विवाद 25 मार्च, 2026 को संसद द्वारा पारित संशोधन विधेयक के बाद शुरू हुआ है, जिसे 30 मार्च, 2026 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली थी।

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2026 का यह संशोधन मुख्य रूप से इसके सीमित दायरे के कारण कानूनी विवादों के घेरे में है। इस कानून के तहत ‘सामाजिक रुझान’ (social orientations) को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह प्रावधान 2019 के मूल अधिनियम के उद्देश्य को कमजोर करता है और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

इसके अलावा, संशोधित अधिनियम में नुकसान की गंभीरता के आधार पर सजा का प्रावधान किया गया है। नए नियमों के अनुसार, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को पहुंचाए गए नुकसान की तीव्रता के आधार पर सजा तय की जाएगी, जबकि पहले विशिष्ट अपराधों के लिए एक समान सजा का प्रावधान था।

सोमवार की कार्यवाही के दौरान, दो न्यायाधीशों की बेंच ने माना कि इस मामले में महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न शामिल हैं। मामले की गहराई से जांच के लिए अदालत ने इसे तीन न्यायाधीशों की एक बड़ी बेंच के पास भेजने का निर्देश दिया है। इस विशेष बेंच का गठन मुख्य न्यायाधीश द्वारा किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद तय की है। इस अवधि के दौरान केंद्र और राज्य सरकारों को अपना जवाबी हलफनामा (counter-affidavit) दाखिल करना होगा।

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