“क्या आप देश के मुख्य पुजारी हैं?”: सबरीमाला PIL को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों की एसोसिएशन को लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन को आड़े हाथों लिया। कोर्ट ने 2006 में दायर उस जनहित याचिका (PIL) पर सवाल उठाए, जिसमें केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को चुनौती दी गई थी। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इस याचिका को “कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग” करार दिया और एसोसिएशन के उद्देश्यों पर गंभीर टिप्पणी की।

सुनवाई के दौरान पीठ ने, जिसमें जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जोयमालया बागची शामिल हैं, धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़ी कई याचिकाओं पर विचार किया।

सुनवाई तब गरमा गई जब एसोसिएशन के वकील रवि प्रकाश गुप्ता ने दलील दी कि 2006 की यह PIL चार अखबारों की खबरों पर आधारित थी। उन्होंने कहा कि एसोसिएशन भगवान अयप्पा के भक्तों की आस्था को चुनौती नहीं दे रही, बल्कि उसे बनाए रखने का प्रयास कर रही है।

इस पर पीठ ने तीखी प्रतिक्रिया दी। जस्टिस नागरत्ना ने सवाल किया, “आप जैसी एक संस्था की कोई अपनी मान्यता कैसे हो सकती है? यह व्यक्तिगत विषय है। आपका कोई अंतःकरण (conscience) नहीं होता।”

जस्टिस अरविंद कुमार ने एसोसिएशन की आंतरिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए पूछा, “क्या आपकी संस्था ने PIL दाखिल करने के लिए कोई प्रस्ताव पारित किया है? क्या आपके अध्यक्ष ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं?”

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CJI सूर्यकांत ने कड़ा रुख अपनाते हुए पूछा, “आपने यह PIL क्यों दाखिल की है? क्या आप देश के मुख्य पुजारी हैं?”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एसोसिएशन को अपनी ऊर्जा धार्मिक परंपराओं को चुनौती देने के बजाय कानूनी बिरादरी के कल्याण में लगानी चाहिए। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि एसोसिएशन को बार के युवा सदस्यों की मदद करनी चाहिए, विशेषकर उन ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले वकीलों की जिन्हें शहरों में आकर वकालत करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

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जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की, “क्या यंग लॉयर्स एसोसिएशन के पास और कोई काम नहीं है? क्या वे बार के कल्याण के लिए काम नहीं कर सकते या देश की कानूनी व्यवस्था में पीठ की सहायता नहीं कर सकते? बार के लिए काम करें, युवा सदस्यों और उनके कल्याण के लिए काम करें। ग्रामीण इलाकों में संघर्ष कर रहे मेधावी युवाओं को शहरों में आकर बहस करने में दिक्कत होती है। सुप्रीम कोर्ट में यह सब करने के बजाय अपना समय वहां लगाएं।”

यह सुनवाई धार्मिक अधिकारों और लैंगिक समानता के बीच संतुलन की समीक्षा का हिस्सा है। इससे पहले, सितंबर 2018 में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी और सदियों पुरानी इस प्रथा को असंवैधानिक घोषित किया था।

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मंगलवार की कार्यवाही में एसोसिएशन के वकील ने मंदिर के ‘तंत्री’ (पुजारी) के बयानों का भी हवाला दिया और नौ-न्यायाधीशों की पीठ के गठन के संबंध में कुछ न्यायाधीशों द्वारा की गई टिप्पणियों पर आपत्ति जताई। फिलहाल इस मामले की सुनवाई जारी है।

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