इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें वैध विवाह के दौरान पैदा हुए बच्चे का पितृत्व निर्धारित करने के लिए DNA टेस्ट की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 112 के तहत वैधता का ‘निर्णायक प्रमाण’ (Conclusive Proof) तब तक अटूट रहता है जब तक यह साबित न हो जाए कि गर्भधारण के समय पति-पत्नी का एक-दूसरे के साथ कोई संपर्क (Non-access) नहीं था।
न्यायमूर्ति नंद प्रभा शुक्ला की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि कानून “जैविक पितृत्व के ऊपर सामाजिक पितृत्व” (Social parentage over biological parentage) को प्राथमिकता देता है और DNA टेस्ट का आदेश सामान्य या नियमित तौर पर नहीं दिया जाना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता महिला का विवाह वर्ष 2012 में हुआ था। आरोप है कि शादी के बरकरार रहते हुए ही 2018-19 में महिला के विपक्षी संख्या-2 के साथ संबंध बन गए और 12 जुलाई 2020 को एक पुत्र का जन्म हुआ।
बच्चे के पितृत्व पर संदेह होने पर पति ने निजी तौर पर DNA टेस्ट कराया, जिसमें सामने आया कि वह बच्चे का जैविक पिता नहीं है। इसके बाद पति ने 24 अगस्त 2020 को तलाक की याचिका दायर की। इसी बीच, पत्नी ने बच्चे के लिए विपक्षी संख्या-2 के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा पेश किया। इस कार्यवाही के दौरान, पत्नी ने बच्चे और विपक्षी संख्या-2 का DNA टेस्ट कराने के लिए एक आवेदन दिया ताकि पितृत्व का वैज्ञानिक निर्धारण हो सके।
आगरा की फैमिली कोर्ट ने 19 जनवरी 2026 को इस आवेदन को खारिज कर दिया था, जिसे अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने अपने विश्लेषण का केंद्र भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 112 को बनाया। यह धारा स्पष्ट करती है कि वैध विवाह के दौरान पैदा हुआ बच्चा वैधता का ‘निर्णायक प्रमाण’ है, जब तक कि यह सिद्ध न हो जाए कि पति-पत्नी के बीच संपर्क की कोई संभावना नहीं थी।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया:
- वैधता का अनुमान: इवान राथिनम बनाम मिलन जोसेफ (2025) का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि धारा 112 एक मजबूत धारणा बनाती है कि पति ही पिता है। ‘अवैधता’ का दावा करने वाले व्यक्ति को ‘संपर्क न होने’ (Non-access) को साबित करना अनिवार्य है।
- संपर्क (Access) का अर्थ: अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘संपर्क’ का मतलब केवल शारीरिक संबंध नहीं, बल्कि वैवाहिक संबंधों के अवसर की संभावना से है।
- अंतिम विकल्प के रूप में DNA टेस्ट: गौतम कुंडू बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1993) और भबानी प्रसाद जेना (2010) का हवाला देते हुए कोर्ट ने जोर दिया कि DNA टेस्ट का आदेश तभी दिया जा सकता है जब “अत्यधिक आवश्यकता” (Eminent need) हो और सच्चाई तक पहुंचने का कोई दूसरा रास्ता न बचा हो।
पीठ ने अपर्णा अजिंक्य फिरोदिया बनाम अजिंक्य अरुण फिरोदिया (2024) के एक महत्वपूर्ण अंश को उद्धृत किया:
“ऐसी स्थिति में, पत्नी की ओर से व्यभिचार (Adultery) साबित हो सकता है, लेकिन कानून में बच्चे की वैधता फिर भी निर्णायक बनी रहेगी। वैध विवाह के दौरान पैदा हुए बच्चे की वैधता का निर्णायक प्रमाण यह है कि बच्चा पति का है और इसे केवल एक DNA टेस्ट रिपोर्ट के आधार पर नहीं झुठलाया जा सकता।”
हाईकोर्ट का निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने पाया कि चूंकि गर्भधारण के समय पत्नी और पति साथ रह रहे थे, इसलिए उनके बीच ‘संपर्क’ (Access) मौजूद था। अदालत ने टिप्पणी की:
“भले ही यह मान लिया जाए कि याचिकाकर्ता संख्या-1 के विपक्षी संख्या-2 के साथ संबंध थे, लेकिन यह तथ्य अपने आप में वैधता के कानूनी अनुमान को हटाने के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि पति और विपक्षी संख्या-2 दोनों का एक साथ संपर्क (Simultaneous access) था।”
आर. राजेंद्रन बनाम कमर निशा (2025) के हालिया फैसले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि धारा 112 बच्चों को बिना ठोस सबूत या केवल संदेह के आधार पर अवैध घोषित होने से बचाने के लिए एक “मजबूत दीवार” की तरह काम करती है।
अदालत ने माना कि इस मामले में DNA प्रोफाइलिंग की कोई “अत्यधिक आवश्यकता” नहीं है और फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए याचिका को खारिज कर दिया।
केस विवरण:
- केस का शीर्षक: श्रीमती मानसी त्यागी और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस संख्या: आवेदन धारा 528 बीएनएसएस संख्या 10028/2026
- पीठ: न्यायमूर्ति नंद प्रभा शुक्ला
- दिनांक: 4 मई, 2026

