हाईकोर्ट वैकल्पिक उपचारों का उपयोग किए बिना अनुच्छेद 226 के तहत एफआईआर दर्ज करने का निर्देश नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें पुलिस को एफआईआर (FIR) दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि जब कानून में प्रभावी वैकल्पिक उपचार (Alternative Remedies) मौजूद हों, तब अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के तहत आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के लिए एक चरणबद्ध प्रक्रिया निर्धारित है, जिसका पालन किया जाना अनिवार्य है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला नासिक स्थित ‘ई एंड जी ग्रीन वैली’ नामक संपत्ति से जुड़े एक जटिल व्यावसायिक विवाद से संबंधित है। शिकायतकर्ता कंपनी, ई एंड जी ग्लोबल एस्टेट्स लिमिटेड का आरोप था कि जब कंपनी कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) के तहत वैधानिक रोक (Moratorium) में थी, तब श्रीमती शीतल विश्वास अटावर (अपीलकर्ता नंबर 1) के पक्ष में एक धोखाधड़ीपूर्ण उप-पट्टा विलेख (Sub-lease deed) निष्पादित किया गया था।

आपराधिक आरोप दिसंबर 2024 और अप्रैल 2025 के बीच की घटनाओं से जुड़े हैं। शिकायतकर्ता का दावा है कि आरोपियों ने जाली दस्तावेजों का उपयोग करके संपत्ति की माप के लिए आवेदन दिया और एक महिला ने राजस्व अधिकारियों को गुमराह करने के लिए कंपनी की निदेशक श्रीमती आशा शिवाजीराव सनाप का रूप धारण किया।

जब यह तथ्य सामने आए, तो कंपनी ने भूमि रिकॉर्ड कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई। प्राधिकरण ने दंडात्मक कार्रवाई से इनकार करते हुए शिकायतकर्ता को सक्षम अधिकारी के पास जाने की सलाह दी। इसके बाद मामला पुलिस के पास गया, लेकिन पुलिस ने इसे विभागीय मामला बताकर वापस कर दिया। इससे क्षुब्ध होकर शिकायतकर्ता ने अनुच्छेद 226 के तहत बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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हाईकोर्ट का आदेश और अपील

17 दिसंबर, 2025 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अंतरिम आदेश पारित किया, जिसमें पुलिस को निदेशक का बयान दर्ज करने और कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया। इसके परिणामस्वरूप, भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर नंबर 0194/2025 दर्ज की गई। अपीलकर्ताओं ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और तर्क दिया कि यह एफआईआर वैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए सीधे हाईकोर्ट के निर्देशों पर दर्ज की गई है।

कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट ने विचार किया कि क्या हाईकोर्ट अनुच्छेद 226 के तहत वैकल्पिक उपचारों का सहारा लिए बिना एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दे सकता है। रिट क्षेत्राधिकार पर “स्व-आरोपित प्रतिबंधों” (Self-imposed restrictions) के सिद्धांत का हवाला देते हुए, कोर्ट ने राधा कृष्ण इंडस्ट्रीज बनाम एच.पी. राज्य (2021) मामले का उल्लेख किया और कहा कि अनुच्छेद 226 की शक्तियां व्यापक होने के बावजूद विवेकाधीन हैं। पीठ ने कहा:

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“जब किसी कानून द्वारा कोई अधिकार बनाया जाता है, जो स्वयं उस अधिकार को लागू करने के लिए उपचार या प्रक्रिया निर्धारित करता है, तो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत विवेकाधीन उपचार का उपयोग करने से पहले उस विशेष वैधानिक उपचार का सहारा लिया जाना चाहिए।”

कोर्ट ने सकीरी वासु बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2008) और सुधीर भास्करराव तांबे बनाम हेमंत यशवंत धागे (2016) के फैसलों का भी उल्लेख किया। इन मामलों में यह स्थापित किया गया है कि यदि एफआईआर दर्ज नहीं की जाती है, तो पीड़ित व्यक्ति को पहले पुलिस अधीक्षक (अब BNSS की धारा 173(4)) और फिर मजिस्ट्रेट (अब BNSS की धारा 175(3)) के पास जाना चाहिए, न कि सीधे हाईकोर्ट।

पीठ ने यह भी टिप्पणी की:

“अनुच्छेद 226 सभी शिकायतों के लिए रामबाण नहीं है… ऐसी परिस्थितियों में रिट याचिका स्वीकार करना वास्तव में हाईकोर्ट द्वारा प्रथम दृष्टया फोरम के रूप में कार्य करने जैसा होगा, जिससे पूरी वैधानिक योजना ही उपेक्षित हो जाएगी।”

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निर्णय

कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता कंपनी ने रिट याचिका दायर करने से पहले संबंधित पुलिस अधीक्षक या मजिस्ट्रेट से संपर्क नहीं किया था। मामले में ऐसी कोई “विशेष परिस्थिति” या “जीवन या स्वतंत्रता के उल्लंघन का तत्काल खतरा” नहीं था जो वैधानिक उपचारों को दरकिनार करने का आधार बनता।

नतीजतन, सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया और उसके आधार पर दर्ज एफआईआर नंबर 0194/2025 को भी निरस्त कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने पक्षों को कानून के अनुसार उपलब्ध वैकल्पिक उपचारों का उपयोग करने की स्वतंत्रता दी है और स्पष्ट किया है कि उसने मामले के गुणों या आपराधिक आरोपों की सत्यता पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।

केस विवरण:

  • केस का शीर्षक: सुजल विश्वास अटावर और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या ___/2026 (@SLP(Crl.) No.1088/2026)
  • पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
  • दिनांक: 4 मई, 2026

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