अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के 2020 के भाषणों में कोई संज्ञेय अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि शाहीन बाग में सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान भाजपा नेताओं अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा द्वारा दिए गए भाषणों में कोई संज्ञेय अपराध (cognisable offence) नहीं बनता है। हालांकि, कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने के लिए ‘पूर्व मंजूरी’ (prior sanction) की आवश्यकता पर निचली अदालतों के तर्क को खारिज कर दिया, लेकिन अंततः इस निष्कर्ष को बरकरार रखा कि भाषणों की सामग्री आपराधिक कार्रवाई के लायक नहीं थी।

यह कानूनी विवाद सीपीआई (एम) नेताओं बृंदा करात और के.एम. तिवारी द्वारा दायर शिकायतों से शुरू हुआ था। उन्होंने आरोप लगाया था कि 27 जनवरी, 2020 को तत्कालीन केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने रिठाला में एक रैली में नफरत फैलाने वाला भाषण दिया था। इसके साथ ही, यह भी दावा किया गया कि 28 जनवरी, 2020 को दिल्ली सरकार में मंत्री प्रवेश वर्मा ने भड़काऊ बयान दिए थे।

याचिकाकर्ताओं ने शुरुआत में ट्रायल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की थी। 26 अगस्त, 2020 को ट्रायल कोर्ट ने इस आधार पर शिकायत खारिज कर दी थी कि सक्षम अधिकारियों से आवश्यक मंजूरी नहीं ली गई थी। जून 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।

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जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने 29 अप्रैल को दिए अपने 125 पन्नों के फैसले में भाषणों और 26 फरवरी, 2020 की स्टेटस रिपोर्ट सहित सभी सामग्रियों का स्वतंत्र मूल्यांकन किया।

कोर्ट ने पाया कि ये बयान किसी विशिष्ट समुदाय के खिलाफ नहीं थे और न ही इनसे हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था फैली।

पीठ ने कहा, “रिकॉर्ड पर रखी गई सामग्री, जिसमें कथित भाषण भी शामिल हैं, पर सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद… हम इस निष्कर्ष से सहमत हैं कि कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है।”

अदालत ने हेट स्पीच को संवैधानिक मूल्य ‘बंधुत्व’ के मूल रूप से विपरीत बताया, लेकिन इस तर्क को खारिज कर दिया कि इस मामले में हस्तक्षेप के लिए कोई “विधायी शून्यता” (legislative vacuum) है। बेंच ने नोट किया कि मौजूदा कानूनी ढांचा पर्याप्त है और शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत न्यायपालिका को नए अपराध बनाने की अनुमति नहीं देता है।

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इस फैसले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 196 और 197 के तहत ‘पूर्व मंजूरी’ की कानूनी आवश्यकता पर केंद्रित था। हाईकोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने के निर्देश देने से आंशिक रूप से इसलिए इनकार कर दिया था क्योंकि ऐसी मंजूरी नहीं ली गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्पष्ट रूप से “नामंजूर” कर दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि मंजूरी की आवश्यकता केवल अदालत द्वारा “संज्ञान लेने” (taking cognisance) के लिए एक शर्त है, न कि एफआईआर दर्ज करने या जांच शुरू करने के लिए।

पीठ ने टिप्पणी की:

“इसके विपरीत व्याख्या करना विधायिका द्वारा परिकल्पना न की गई पाबंदी को लागू करने जैसा होगा… मंजूरी की आवश्यकता को उस स्थिति में जांच प्रक्रिया की शुरुआत को रोकने के लिए ढाल के रूप में उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जहां संज्ञेय अपराध का खुलासा होता हो।”

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अदालत ने जोर देकर कहा कि प्रारंभिक स्तर पर अधिकारियों द्वारा अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन न करना विधायी मंशा को विफल करता है और नागरिकों को संस्थागत निष्क्रियता के प्रति संवेदनशील बनाता है। हालांकि, चूंकि भाषणों में कोई संज्ञेय अपराध नहीं पाया गया, इसलिए कोर्ट ने याचिका को खारिज करने के फैसले में हस्तक्षेप नहीं किया।

अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाओं को खारिज कर दिया और पुष्टि की कि ये भाषण आपराधिक अभियोजन की सीमा में नहीं आते हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने आपराधिक जांच में प्रशासनिक मंजूरी के समय से संबंधित कानूनी व्याख्या को भी स्पष्ट किया।

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