₹1,900 करोड़ के सूरत टेक्सटाइल प्रोजेक्ट विवाद में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम, पूर्व CJI संजीव खन्ना को नियुक्त किया मध्यस्थ

सुप्रीम कोर्ट ने ₹1,900 करोड़ की कथित धोखाधड़ी से जुड़े एक हाई-प्रोफाइल कानूनी विवाद में हस्तक्षेप करते हुए, पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया है। यह मामला प्रमुख व्यवसायी अशोकभाई हरिभाई गजेरा और उनके पूर्व बिजनेस पार्टनर के बीच चल रहे लंबे विवाद को सुलझाने के लिए है।

चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ गजेरा और दो अन्य व्यक्तियों द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई कर रही थी। यह अपील गुजरात हाईकोर्ट के 11 मार्च के उस आदेश के खिलाफ थी, जिसमें हाईकोर्ट ने सूरत में कपड़ा बाजार परियोजनाओं से संबंधित आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और आपराधिक साजिश के आरोपों वाली एफआईआर (FIR) को रद्द करने से इनकार कर दिया था।

इस कानूनी विवाद की शुरुआत रियल एस्टेट फर्म ‘शांति रेजिडेंसी प्राइवेट लिमिटेड’ के पूर्व पार्टनर प्रवीण देवकीनंदन अग्रवाल द्वारा दर्ज कराई गई एक आपराधिक शिकायत से हुई थी। अग्रवाल, जिनकी फर्म में पहले 43 प्रतिशत हिस्सेदारी थी, ने आरोप लगाया कि अशोकभाई, वसंत, चुन्नी और बकुल गजेरा भाइयों ने पांच अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर हवाला के जरिए लगभग ₹1,928.39 करोड़ हांगकांग भेजे हैं।

इसके अलावा, अग्रवाल का दावा है कि उनके, उनकी पत्नी और उनके पिता के हस्ताक्षर 14 अलग-अलग दस्तावेजों पर फर्जी तरीके से किए गए। अग्रवाल के अनुसार, इन दस्तावेजों का उपयोग यह दिखाने के लिए किया गया कि उन्होंने भविष्य में शेयरों के आवंटन को अस्वीकार कर दिया है, जिससे उनकी हिस्सेदारी 43 प्रतिशत से घटकर महज चार प्रतिशत रह गई।

गजेरा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि यह मामला पूरी तरह से दीवानी (Civil) और व्यावसायिक प्रकृति का है, न कि आपराधिक। उन्होंने कार्यवाही में “अत्यधिक देरी” का भी मुद्दा उठाया और कहा कि कथित घटनाएं 2010 से 2015 के बीच की हैं, जबकि एफआईआर फरवरी 2026 में दर्ज की गई। बचाव पक्ष ने इस एफआईआर को उगाही के उद्देश्य से अपनाया गया एक “दबाव बनाने का हथकंडा” बताया।

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वहीं, अग्रवाल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने एफआईआर को रद्द करने का कड़ा विरोध किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि करीब ₹1,900 करोड़ की हेराफेरी करने के लिए कई दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ की गई थी। इससे पहले, गुजरात हाईकोर्ट ने भी नोट किया था कि फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट प्रथम दृष्टया हस्ताक्षरों के फर्जी होने की पुष्टि करती है, जो आपराधिक कार्यवाही जारी रखने के लिए पर्याप्त आधार है।

आपराधिक आरोपों की गंभीरता के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दोनों पक्ष मध्यस्थता के माध्यम से विवाद को सुलझाने के सुझाव पर सहमत हो गए।

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पीठ ने इस आपसी सहमति को ध्यान में रखते हुए पूर्व CJI संजीव खन्ना को इस प्रक्रिया का नेतृत्व करने के लिए नियुक्त किया। अदालत ने वकीलों को जस्टिस खन्ना के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया है, जो भविष्य की कार्ययोजना और अपने शुल्क का निर्धारण करेंगे। इस शुल्क का भुगतान दोनों पक्षों द्वारा समान रूप से किया जाएगा।

जब तक मध्यस्थता की प्रक्रिया चलेगी, सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को फर्म की संपत्तियों के संबंध में ‘यथास्थिति’ (Status Quo) बनाए रखने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस अवधि के दौरान एफआईआर के सिलसिले में गजेरा भाइयों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।

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