लोक अदालत फाइनल रिपोर्ट को खारिज करने या संज्ञान लेने का अधिकार नहीं रखती: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परिवाद की कार्यवाही और समन आदेश को रद्द किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक परिवाद मामले (complaint case) में जारी समन आदेश और पूरी कार्यवाही को यह कहते हुए रद्द कर दिया है कि लोक अदालत के पास पुलिस की फाइनल रिपोर्ट (FR) को खारिज करने या विरोध याचिका (protest petition) को परिवाद के रूप में दर्ज करने का न्यायिक अधिकार नहीं है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोक अदालतें शुद्ध रूप से समझौता कराने वाले मंच (conciliatory forums) हैं और पक्षकारों के बीच समझौता न होने की स्थिति में वे गुणों के आधार पर मामले का फैसला करने या न्यायिक आदेश पारित करने का अधिकार नहीं रखती हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बांदा जिले के अतर्रा थाने में दर्ज एनसीआर नंबर 141/2015 से जुड़ा है। पुलिस ने जांच के बाद 10 दिसंबर 2016 को फाइनल रिपोर्ट (नंबर शून्य/2016) पेश की थी, जिसमें कहा गया था कि कोई मामला नहीं बनता है। इसके खिलाफ शिकायतकर्ता ने विरोध याचिका दायर की। 9 दिसंबर 2017 को राष्ट्रीय लोक अदालत में बैठते हुए बांदा के न्यायिक मजिस्ट्रेट ने पुलिस की फाइनल रिपोर्ट को खारिज कर दिया और मामले को परिवाद के रूप में चलाने का आदेश दिया।

इसके परिणामस्वरूप, 28 मार्च 2024 को आवेदकों—श्रीमती मय्या उर्फ प्रेम कुमारी, श्रीमती रंजना और कुमारी बंदना—के खिलाफ आईपीसी की धारा 323, 504 और 506 के तहत शिकायत केस संख्या 725/नौ/2017 में समन जारी किया गया। आवेदकों ने लोक अदालत के इस आदेश और उसके बाद जारी समन को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी।

पक्षकारों की दलीलें

आवेदकों के वकील ने तर्क दिया कि लोक अदालत ने न्यायिक आदेश पारित करके अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले स्टेट ऑफ पंजाब बनाम गणपत राज (2006) 8 SCC 364 का हवाला देते हुए कहा कि लोक अदालतें मामलों का निर्णय नहीं कर सकतीं।

राज्य की ओर से विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता (A.G.A.) ने भी सहमति जताई कि लोक अदालत में इस मामले का निर्णय सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस अचल सचदेव ने विधिक सेवा प्राधिकरण (LSA) अधिनियम, 1987 के दायरे का विश्लेषण किया। हाईकोर्ट ने उल्लेख किया कि अधिनियम की धारा 21 के तहत लोक अदालत के प्रत्येक पंचाट (award) को सिविल कोर्ट की डिक्री माना जाता है, लेकिन यह प्रावधान केवल तभी लागू होते हैं जब पक्षकारों के बीच समझौता हो गया हो।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“लोक अदालत के सदस्य के रूप में बैठते समय मजिस्ट्रेट के पास सीमित अधिकार क्षेत्र होता है। लोक अदालत की प्राथमिक भूमिका विवाद के संबंध में पक्षकारों की सहमति के आधार पर उनके बीच समझौता कराना है। यदि कोई समझौता नहीं होता है, तो लोक अदालत को केस रिकॉर्ड नियमित अदालत को वापस करना अनिवार्य है।”

हाईकोर्ट ने आगे स्पष्ट किया:

“यह फाइनल रिपोर्ट को खारिज करने या इसे परिवाद के रूप में मानने जैसे न्यायिक कार्य नहीं कर सकती। फाइनल रिपोर्ट को खारिज करने और परिवाद प्रक्रिया अपनाने का कोई भी न्यायिक आदेश उस नियमित अदालत द्वारा दिया जाना चाहिए जहाँ मामला मूल रूप से लंबित था।”

सुप्रीम कोर्ट के एस्टेट ऑफिसर बनाम कर्नल एच.वी. मनकोटिया (2021 SCC ONLINE SC 898) के फैसले का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि लोक अदालतें केवल समझौते के लिए हैं, न कि न्यायनिर्णयन (adjudication) के लिए। अदालत ने कहा कि यदि समझौता नहीं होता है, तो अधिनियम की धारा 20(5) के तहत रिकॉर्ड को संबंधित अदालत को वापस भेजा जाना चाहिए।

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हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि “फाइनल रिपोर्ट को खारिज करना” या “संज्ञान लेना” न्यायिक कार्य हैं जिन्हें मजिस्ट्रेट को अपनी नियमित अदालत की क्षमता में करना चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि 9 दिसंबर 2017 का आदेश बिना क्षेत्राधिकार के पारित किया गया था, इसलिए यह एक “शून्य आदेश” (jurisdictional nullity) था, जिसने उसके बाद की हर कार्यवाही और समन आदेश को दूषित कर दिया।

निर्णय

हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले में लोक अदालत ने न्यायिक भूमिका अपनाई और सर्वसम्मति के अभाव की अनदेखी करते हुए फाइनल रिपोर्ट को खारिज करने का आदेश दिया। जस्टिस सचदेव ने आदेश दिया:

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“कानून की दृष्टि में और सुप्रीम कोर्ट द्वारा विभिन्न निर्णयों में दिए गए सिद्धांतों के अनुसार, 28.03.2024 का समन आदेश, 09.12.2017 का आदेश और शिकायत केस संख्या 725/नौ/2017 की पूरी कार्यवाही कानून में टिकने योग्य नहीं है और इसे एतद्द्वारा रद्द किया जाता है।”

बीएनएसएस की धारा 528 के तहत आवेदन को स्वीकार किया गया और आवेदकों के खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी गई।

केस का विवरण:

  • केस शीर्षक: श्रीमती मय्या @ प्रेम कुमारी और 2 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
  • केस संख्या: आवेदन संख्या 528 बीएनएसएस संख्या 7481/2025
  • पीठ: जस्टिस अचल सचदेव
  • आवेदक के वकील: मार्कंडेय राय, प्रदीप कुमार राय, संदीप कुमार राय
  • विपक्षी के वकील: अनिल कुमार दुबे (ए.जी.ए.), राम मिलन द्विवेदी
  • दिनांक: 23 अप्रैल, 2026

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