सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: ISRO यूनिट में काम करने वाले दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों के नियमितीकरण का आदेश; 2012 की ‘गैंग लेबरर्स स्कीम’ रद्द

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले को पलटते हुए केंद्र सरकार को लिक्विड प्रोपल्शन सिस्टम सेंटर (LPSC) की महेंद्रगिरि यूनिट में कार्यरत दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों की सेवाओं को नियमित करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “गैंग लेबरर्स (एम्प्लॉयमेंट फॉर स्पोरैडिक टाइप्स ऑफ वर्क) स्कीम, 2012” उन न्यायिक आदेशों का पालन करने में विफल रही, जिनमें दशकों से सेवा दे रहे श्रमिकों के लिए स्थायी पदों के सृजन की बात कही गई थी।

कानूनी मुद्दा

इस मामले में मुख्य विवाद यह था कि क्या प्रतिवादियों द्वारा तैयार की गई “गैंग लेबरर्स स्कीम, 2012” केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) द्वारा 2010 में दिए गए उन निर्देशों का पालन करती है, जो पहले ही अंतिम रूप ले चुके थे। अपीलकर्ता, जिन्हें 1991 और 1997 के बीच दैनिक वेतन भोगी के रूप में नियुक्त किया गया था, अपनी सेवाओं के नियमितीकरण और स्थायी स्थिति की मांग कर रहे थे।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने अपील स्वीकार करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के 2024 के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने आदेश दिया कि अपीलकर्ताओं की सेवाओं को 9 सितंबर, 2010 से नियमित किया जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ताओं को महेंद्रगिरि यूनिट में लोडिंग, अनलोडिंग और सामान की शिफ्टिंग जैसे छिटपुट कार्यों के लिए दैनिक वेतन भोगी के रूप में रखा गया था। यह क्षेत्र आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (Official Secrets Act) के तहत प्रतिबंधित क्षेत्र है। 2009 में, इन श्रमिकों ने नियमितीकरण के लिए न्यायाधिकरण (Tribunal) का दरवाजा खटखटाया था।

9 मार्च, 2010 को न्यायाधिकरण ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया था कि वे आवश्यक पदों का सृजन करके ऐसे व्यक्तियों को “स्थायी आधार” पर नियोजित करने के लिए एक योजना या तदर्थ नियम बनाएं। इस आदेश की पुष्टि 2011 में मद्रास हाईकोर्ट द्वारा की गई थी और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार की याचिका खारिज कर इस पर मुहर लगा दी थी।

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इसके अनुपालन में, प्रतिवादियों ने 2012 में “गैंग लेबरर्स स्कीम” बनाई। हालांकि, अपीलकर्ताओं ने इस योजना को चुनौती देते हुए कहा कि यह केवल 60 वर्ष की आयु तक “अस्थायी दर्जा” प्रदान करती है और आदेश के अनुसार स्थायी पदों का सृजन नहीं करती है। न्यायाधिकरण और बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने कर्नाटक राज्य बनाम उमादेवी (2006) मामले का हवाला देते हुए अपीलकर्ताओं के दावों को खारिज कर दिया था।

पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता: अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि 2010 के न्यायाधिकरण के आदेश ने स्पष्ट रूप से पदों के सृजन के माध्यम से नियमितीकरण का आदेश दिया था। उन्होंने दलील दी कि 2012 की योजना इस आदेश के विपरीत थी और वर्षों तक निरंतर कार्य करने के बावजूद दैनिक वेतन भोगी के रूप में बनाए रखना संविधान के अनुच्छेद 23 का उल्लंघन है।

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प्रतिवादी: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल श्री एस.डी. संजय ने तर्क दिया कि अपीलकर्ताओं को केवल आवश्यकता के आधार पर छिटपुट कार्यों के लिए लगाया गया था। उन्होंने कहा कि कानूनी अर्थों में कोई नियोक्ता-कर्मचारी संबंध मौजूद नहीं था और 2012 की योजना, जो 60 वर्ष की आयु तक रोजगार सुनिश्चित करती है, न्यायाधिकरण के निर्देशों के अनुरूप थी।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि 2010 के न्यायाधिकरण के निर्देश के दो मुख्य पहलू थे: पहला, संवेदनशील आरएंडडी इकाई में सुरक्षा कारणों से रोजगार को व्यवस्थित करना और दूसरा, 14 से 26 वर्षों का अनुभव रखने वाले श्रमिकों को प्राथमिकता देना।

कोर्ट ने कहा:

“मुकदमेबाजी के पहले दौर में जारी किए गए निर्देशों का सार एक तदर्थ, दैनिक वेतन व्यवस्था से विधिवत सृजित पदों पर आधारित एक संरचित शासन में परिवर्तन लाना था… कोई भी योजना जो इस आवश्यकता से कम है… उसे उक्त निर्देशों के अक्षर और भावना के अनुपालन में नहीं कहा जा सकता है।”

पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट की इस बात के लिए आलोचना की कि उसने उमादेवी मामले के तहत नियमितीकरण की योग्यता पर फिर से विचार किया, जबकि इन अपीलकर्ताओं के लिए विशिष्ट निर्देश पहले ही अंतिम हो चुके थे।

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के इतिहास का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“ऐसे व्यक्तियों की उपेक्षा करना या उनके साथ भेदभाव करना… उस सामूहिक लोकाचार को कमजोर करना होगा जिसने भारत को चंद्रमा और उससे आगे पहुँचाया। राज्य, एक आदर्श नियोक्ता (Model Employer) के रूप में, अपने कार्यबल के एक वर्ग के साथ… मनमाने ढंग या उदासीनता से व्यवहार नहीं कर सकता है।”

अंतिम निर्णय

न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि 2012 की योजना के क्लॉज 4 और अन्य प्रावधान, जो केवल “अस्थायी आधार” पर रोजगार की बात करते हैं, 2010 के जनादेश के साथ असंगत थे।

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सुप्रीम कोर्ट का आदेश:

  1. “गैंग लेबरर्स स्कीम, 2012” को उस सीमा तक रद्द किया जाता है जहां तक यह स्थायी नियोजन के निर्देश के साथ असंगत है।
  2. प्रतिवादियों को अपीलकर्ताओं को नियमित करने और उन्हें 9 सितंबर, 2010 से स्थायी दर्जा देने का निर्देश दिया जाता है।
  3. इस निर्णय का लाभ उक्त योजना के तहत नियोजित अन्य सभी समान रूप से स्थित व्यक्तियों को भी मिलेगा।
  4. इस प्रक्रिया को चार सप्ताह के भीतर पूरा किया जाना अनिवार्य है।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: आर. अय्यप्पन एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील नंबर ___ ऑफ 2026 (@ SLP (C) No. 7138 of 2025)
  • पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
  • दिनांक: 29 अप्रैल, 2026

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