बॉम्बे हाईकोर्ट ने अभिनेता शेखर सुमन और कलाकार भारती सिंह के विरुद्ध दर्ज उस प्राथमिकी (FIR) को रद्द कर दिया है, जिसमें उन पर एक कॉमेडी शो के दौरान धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाया गया था। जस्टिस अमित बोरकर की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि हास्य कार्यक्रमों में मजाक के तौर पर इस्तेमाल किए गए शब्दों से भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 295-A के तहत आवश्यक “जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे” की पुष्टि नहीं होती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद 20 नवंबर 2010 को सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन (SET) पर प्रसारित कार्यक्रम “कॉमेडी सर्कस का जादू” के एक एपिसोड से शुरू हुआ था। इस शो में याचिकाकर्ता भारती सिंह “उमराव जान” के किरदार में थीं, जबकि शेखर सुमन जज की भूमिका निभा रहे थे।
रजा एकेडमी के अध्यक्ष मोहम्मद इमरान दादनी रसाबी ने पायधुनी पुलिस स्टेशन में इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई थी। FIR के अनुसार, शो के दौरान “या अल्लाह! रसगुल्ला! दही भल्ला!” जैसे शब्दों के प्रयोग से मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँची है। इसके बाद पुलिस ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए, जिसे याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं के तर्क: याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नितिन प्रधान ने दलील दी कि यह कार्यक्रम पूरी तरह से मनोरंजन और हास्य पर आधारित था। उनके मुख्य तर्क इस प्रकार थे:
- IPC की धारा 295-A के लिए आवश्यक ‘जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादा’ इस मामले में कहीं भी नजर नहीं आता।
- ‘दही भल्ला’ और ‘रसगुल्ला’ आम खाद्य पदार्थ हैं जिनका कोई धार्मिक संदर्भ नहीं है।
- दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 196 के तहत आवश्यक पूर्व अनुमति (Sanction) नहीं ली गई थी, जो ऐसे मामलों में कानूनी कार्यवाही शुरू करने की अनिवार्य शर्त है।
- याचिकाकर्ताओं ने रामजी लाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1957) मामले का हवाला देते हुए कहा कि बिना दुर्भावना के अनजाने में पहुँची ठेस इस धारा के दायरे में नहीं आती।
राज्य सरकार का तर्क: अतिरिक्त लोक अभियोजक मेघा बाजोरिया ने FIR का बचाव करते हुए कहा कि लगाए गए आरोप संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए मामले की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में होनी चाहिए, जहाँ साक्ष्यों का परीक्षण किया जा सके।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस अमित बोरकर ने अपने निर्णय में कहा कि किसी भी प्रदर्शन को उसके संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उन्होंने टिप्पणी की कि “एक कॉमेडी शो को उसी नजरिए से नहीं देखा जा सकता जैसे किसी सैद्धांतिक भाषण या राजनीतिक बयान को देखा जाता है।”
धारा 295-A की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने कहा:
“इस धारा की भाषा स्पष्ट रूप से किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के ‘जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे’ की बात करती है। ये दोनों तत्व अनिवार्य हैं। यदि इनमें से एक भी अनुपस्थित है, तो अपराध पूरी तरह से सिद्ध नहीं माना जा सकता।”
कोर्ट ने पाया कि “या अल्लाह! रसगुल्ला! दही भल्ला!” जैसे शब्द केवल तुकबंदी और हास्य पैदा करने के लिए कहे गए थे। हाईकोर्ट ने उल्लेख किया कि खाद्य पदार्थों के नाम सामान्य सामाजिक व्यवहार में तटस्थ होते हैं और हास्य अभिनय में इनका जिक्र करना धर्म का अपमान नहीं माना जा सकता।
‘समान इरादे’ (धारा 34 IPC) का अभाव
अदालत ने यह भी पाया कि केवल कार्यक्रम में मौजूद होने या टीवी शो का हिस्सा होने मात्र से ‘समान इरादे’ (Common Intention) की धारणा नहीं बनाई जा सकती। विशेष रूप से शेखर सुमन के संदर्भ में कोर्ट ने कहा कि उन्होंने न तो वे शब्द कहे थे और न ही धर्म के अपमान की उनकी कोई योजना थी।
धारा 196 CrPC के तहत अनिवार्य अनुमति का न होना
हाईकोर्ट ने पूर्व अनुमति के अभाव को एक गंभीर कानूनी खामी माना। कोर्ट के अनुसार:
“यह प्रावधान अनिवार्य है और इसका उद्देश्य संवेदनशील सार्वजनिक अभिव्यक्ति के मामलों में अभियोजन के दुरुपयोग को रोकना है… इसकी अनुपस्थिति पूरी कानूनी कार्यवाही को दोषपूर्ण बनाती है।”
अंत में, कोर्ट ने कलाकारों के खिलाफ सतही तौर पर आपराधिक कानून लागू करने की प्रवृत्ति की आलोचना की और कहा कि “मुकदमा (Trial), कानूनी आधार का विकल्प नहीं हो सकता।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने दोनों रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए FIR नंबर 265/2010 और उससे जुड़ी सभी कानूनी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अनिवार्य अनुमति के बिना और कानूनी तत्वों के अभाव में कार्यवाही जारी रखना “प्रक्रिया का दुरुपयोग” होगा।
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: शेखर सुमन बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य (भारती सिंह बनाम महाराष्ट्र राज्य के साथ)
- केस नंबर: रिट पिटीशन नंबर 1902 ऑफ 2012 और रिट पिटीशन नंबर 1906 ऑफ 2012
- बेंच: जस्टिस अमित बोरकर
- दिनांक: 29 अप्रैल, 2026

