जवाई लेपर्ड रिजर्व में खनन और निर्माण पर राजस्थान हाईकोर्ट की रोक; वन्यजीव अभयारण्य बनाने पर विचार करने के निर्देश

वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए, राजस्थान हाईकोर्ट ने पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील जवाई लेपर्ड रिजर्व में सभी प्रकार के निर्माण, खनन और अनियमित पर्यटन गतिविधियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। कोर्ट ने ‘जीवन के अधिकार’ का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि लेपर्ड (तेंदुए) के आवासों का संरक्षण केवल एक नीतिगत मामला नहीं, बल्कि एक संवैधानिक अनिवार्यता है।

जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया। इस याचिका में पाली जिले के सुमेरपुर के पास स्थित जवाई क्षेत्र में हो रहे पारिस्थितिक क्षरण पर चिंता जताई गई थी। यह क्षेत्र लगभग 50 से 70 तेंदुओं का घर है और इंसानों तथा वन्यजीवों के सह-अस्तित्व के एक दुर्लभ मॉडल के रूप में दुनिया भर में प्रसिद्ध है।

कोर्ट ने अपने आदेश में एक गहरी पारिस्थितिक अवधारणा को रेखांकित करते हुए कहा, “धरती मनुष्य की नहीं है; मनुष्य धरती का है।” जजों ने टिप्पणी की कि लेपर्ड के आवासों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप संवैधानिक दायित्वों का उल्लंघन है।

बेंच ने वन्यजीवों की सुरक्षा को सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) से जोड़ा और कहा कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी पारिस्थितिक संतुलन से अलग नहीं की जा सकती। कोर्ट ने आगे जोर दिया कि इन आवासों की रक्षा करने में राज्य की विफलता अनुच्छेद 48A और 51A(g) के तहत जनादेश को कमजोर करेगी, जो पर्यावरण की रक्षा को राज्य और नागरिकों का कर्तव्य बताते हैं।

पर्यावरण को होने वाली अपूरणीय क्षति को रोकने के लिए, हाईकोर्ट ने जवाई क्षेत्र में ‘यथास्थिति’ (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया है। इसके तहत निम्नलिखित प्रतिबंध लागू रहेंगे:

  • निर्माण और खनन: खनन गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है और कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना किसी भी नए निर्माण कार्य पर रोक रहेगी।
  • पर्यटन और सफारी: नए पर्यटन लाइसेंस जारी करने पर तत्काल रोक लगा दी गई है। इसके अलावा, रात में होने वाली सफारी (Night Safari) पर लगा प्रतिबंध भी जारी रहेगा।
  • कटीले तार: क्षेत्र में कटीले तारों की बाड़ लगाने पर भी प्रतिबंध लगाया गया है, क्योंकि इससे वन्यजीवों के आवागमन को खतरा होता है।
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क्षेत्र में वन, राजस्व और निजी भूमि के मिश्रण के कारण उत्पन्न “नियामक शून्यता” (Regulatory Vacuum) पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भूमि स्वामित्व की जटिलताएं वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत लेपर्ड जैसी ‘शेड्यूल-I’ प्रजाति की रक्षा के राज्य के कर्तव्य को कम नहीं कर सकतीं।

कोर्ट ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिया है कि वह वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम की धारा 8 और 18 के तहत जवाई क्षेत्र को ‘वन्यजीव अभयारण्य’ घोषित करने की व्यवहार्यता की जांच करे। इस कदम से इस क्षेत्र को और अधिक कानूनी सुरक्षा प्राप्त हो सकेगी।

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इसके साथ ही, कोर्ट ने सफारी संचालन और आवास संरक्षण के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के ड्राफ्ट को तत्काल लागू करने का निर्देश दिया। इन आदेशों के पालन की निगरानी के लिए एक बहु-विभागीय निकाय ‘जवाई सफारी और इको-टूरिज्म समन्वय समिति’ को तुरंत काम शुरू करने को कहा गया है।

राज्य और केंद्र सरकार के अधिकारियों को छह सप्ताह के भीतर इन निर्देशों के तहत की गई कार्रवाई का विवरण देते हुए एक अनुपालन हलफनामा दाखिल करना होगा।

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