इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने एक विशेष अपील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए “विधवा पुत्रवधू” की पात्रता का निर्धारण सरकारी कर्मचारी की मृत्यु की तिथि के संदर्भ में किया जाना अनिवार्य है। डिवीजन बेंच ने आदेश दिया कि जो व्यक्ति कर्मचारी की मृत्यु के समय “पारिवारिक इकाई” का सदस्य नहीं था, वह विवाह या विधवा होने जैसी बाद की घटनाओं के आधार पर पात्रता का दावा नहीं कर सकता।
कानूनी मुद्दा
इस मामले का मुख्य बिंदु यह था कि क्या एक महिला, जिसने सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के लगभग दो साल बाद उसके बेटे से विवाह किया और बाद में विधवा हो गई, अनुकंपा नियुक्ति की हकदार हो सकती है। कोर्ट को उत्तर प्रदेश इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम, 1921 के विनियम 103 से 107 की व्याख्या करनी थी ताकि यह तय किया जा सके कि क्या “विधवा पुत्रवधू” का दर्जा कर्मचारी के निधन के समय अस्तित्व में होना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
श्रीमती संगीता बाजपेयी, जो लखनऊ के नारी शिक्षा निकेतन इंटर कॉलेज में सहायक शिक्षिका थीं, का 23 अप्रैल 2021 को सेवाकाल के दौरान निधन हो गया। उनके परिवार में उनके पति और एक बेरोजगार बेटा, निखिल बाजपेयी थे। बेटे का अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन 10 अप्रैल 2023 को इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि उसके पिता पेंशनभोगी थे।
इसी बीच, निखिल बाजपेयी ने 15 फरवरी 2023 को अपीलकर्ता श्रीमती दीपिका तिवारी से विवाह कर लिया। विवाह के कुछ समय बाद ही 13 मई 2023 को निखिल का निधन हो गया। पति की मृत्यु के बाद, अपीलकर्ता ने श्रीमती संगीता बाजपेयी की “विधवा पुत्रवधू” के रूप में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। हालांकि शुरुआत में उन्हें नियुक्ति का आदेश मिला, लेकिन शिक्षण संस्थान की आपत्तियों के बाद उसे रद्द कर दिया गया। हाईकोर्ट की एकल पीठ द्वारा उनकी चुनौती खारिज होने के बाद यह विशेष अपील दायर की गई थी।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता के तर्क: अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि विनियम 103 में “विधवा पुत्रवधू” को परिवार की परिभाषा में शामिल किया गया है और इसमें विवाह की तिथि की कोई शर्त नहीं है। उन्होंने कहा कि अपीलकर्ता ने “अपने पति के स्थान पर” दावा किया है जो मूल रूप से पात्र थे। अपीलकर्ता ने मानवीय दृष्टिकोण के समर्थन में यू.पी. पावर कॉर्पोरेशन बनाम उर्मिला देवी (2011) और विभा तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2024) के फैसलों का हवाला दिया।
प्रतिवादियों के तर्क: राज्य और संस्थान की ओर से तर्क दिया गया कि अपीलकर्ता मृत्यु के समय मृतक के परिवार की सदस्य नहीं थी। उन्होंने यह भी कहा कि परिवार को तत्काल कोई वित्तीय संकट नहीं था, क्योंकि बेटे ने मृत्यु के दो साल बाद विवाह किया था, जिसमें महत्वपूर्ण खर्च शामिल होता है। इसके अलावा, बेटे के आवेदन की अस्वीकृति को कभी चुनौती नहीं दी गई थी, जिससे वह आदेश अंतिम हो चुका था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की डिवीजन बेंच ने विनियम 103 में प्रयुक्त वाक्यांश “विधवा पुत्रवधू” पर ध्यान केंद्रित किया। कोर्ट ने पाया कि विनियम में “विधवा पुत्रवधू” को तो शामिल किया गया है, लेकिन “पुत्रवधू” शब्द को जानबूझकर बाहर रखा गया है।
बेंच ने टिप्पणी की:
” ‘विधवा पुत्रवधू’ का दर्जा प्राप्त करने के लिए, उस व्यक्ति का पहले ‘पुत्रवधू’ होना आवश्यक है। … तकनीकी रूप से जब सरकारी कर्मचारी जीवित थीं और उनकी मृत्यु की तिथि पर, अपीलकर्ता उनकी पुत्रवधू तक नहीं थी, इसलिए उसके ‘विधवा पुत्रवधू’ होने का प्रश्न ही नहीं उठता।”
हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि विनियम 104 के तहत मृत्यु के सात दिनों के भीतर परिवार के सदस्यों की रिपोर्ट देना आवश्यक है, जो दर्शाता है कि परिवार की स्थिति कर्मचारी की मृत्यु के समय ही तय हो जाती है। डायरेक्टर ऑफ एजुकेशन (सेकेंडरी) बनाम पुष्पेंद्र कुमार (1998) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“अनुकंपा नियुक्ति के प्रावधान का उद्देश्य मृतक कर्मचारी के परिवार को उस अचानक संकट से उबारना है जो परिवार के कमाऊ सदस्य की मृत्यु के कारण उत्पन्न होता है और जिसने परिवार को गरीबी और आजीविका के साधनों के बिना छोड़ दिया है।”
कोर्ट ने आगे कहा कि “परिवार के सदस्य” का अर्थ उन लोगों से होना चाहिए जो मृत्यु के समय आश्रित के रूप में मौजूद थे। बेंच ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता 2023 में विवाह के माध्यम से परिवार में आई और वह उस इकाई का हिस्सा नहीं थी जिसने 2021 में “अचानक संकट” का सामना किया था।
अपीलकर्ता के पति के आवेदन की पूर्व अस्वीकृति पर कोर्ट ने कहा:
“अपीलकर्ता (पत्नी) को उसी नियुक्ति के लिए पात्र कैसे माना जा सकता है, जबकि विधवा पुत्रवधू होने का उसका दावा मृतक के बेटे के माध्यम से ही उत्पन्न होता है (जिसका दावा पहले ही खारिज हो चुका था)।”
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने एकल पीठ के निर्णय को सही ठहराते हुए विशेष अपील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता को नियुक्ति का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि श्रीमती संगीता बाजपेयी की मृत्यु के समय वह परिवार की पुत्रवधू भी नहीं थी। बिहार इंडस्ट्रियल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम मेसर्स स्कोप सेल्स प्राइवेट लिमिटेड (2026) का संदर्भ देते हुए बेंच ने कहा कि विशेष अपील में हस्तक्षेप तभी किया जाना चाहिए जब कोई निर्णय स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण हो, जो इस मामले में नहीं था।
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: श्रीमती दीपिका तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, मुख्य सचिव, माध्यमिक शिक्षा लखनऊ एवं 3 अन्य
- केस संख्या: विशेष अपील संख्या 353 वर्ष 2025
- बेंच: जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी
- दिनांक: 24.04.2026

