महिलाओं को न्यायपालिका में अधिक प्रतिनिधित्व मिले: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने हाईकोर्ट कॉलेजियम से कहा—योग्य महिला वकीलों की नियुक्ति अपवाद नहीं, सामान्य प्रथा बने

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने रविवार को न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए संस्थागत सुधारों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने हाईकोर्ट कॉलेजियम से अपील की कि योग्य महिला अधिवक्ताओं को न्यायाधीश पद पर नियुक्त करने पर गंभीरता से विचार किया जाए और इसे अपवाद नहीं बल्कि सामान्य प्रक्रिया बनाया जाए।

“इंडियन वीमेन इन लॉ” के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि महिला वकील किसी प्रकार की रियायत नहीं मांग रही हैं, बल्कि उन्हें वह उचित प्रतिनिधित्व चाहिए जो लंबे समय से उन्हें मिलना चाहिए था।

उन्होंने कहा, “महिलाएं किसी विशेष छूट की मांग नहीं कर रही हैं। वे केवल न्यायसंगत और उचित प्रतिनिधित्व चाहती हैं, जो उन्हें काफी समय पहले मिल जाना चाहिए था। जब विधि पेशा स्वयं इस सच्चाई को स्वीकार करेगा, तभी उनके लिए न्यायपीठ तक पहुंचने का मार्ग अधिक स्पष्ट होगा।”

मुख्य न्यायाधीश ने हाईकोर्ट कॉलेजियम से आग्रह किया कि वे न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए विचार के दायरे को व्यापक बनाएं। उन्होंने सुझाव दिया कि संबंधित राज्यों से आने वाली और सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर रही महिला अधिवक्ताओं को भी नियुक्ति के लिए शामिल किया जाए।

उन्होंने कहा कि यदि सुधारों को वास्तविक प्रभाव देना है तो उन्हें संस्थागत स्तर पर लागू करना होगा। यह केवल किसी एक व्यक्ति के प्रयास से नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट और देशभर के हाईकोर्ट द्वारा अपनी प्रक्रियाओं में निष्पक्षता को स्थायी रूप से शामिल करने से संभव होगा।

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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि इस तरह के सुधार किसी एक घटना तक सीमित नहीं होते बल्कि यह एक सतत प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि न्यायिक संस्थाओं में निष्पक्षता और समान अवसर की संस्कृति विकसित करने के लिए लगातार प्रयास जरूरी हैं।

उन्होंने कहा, “संभव है कि ऐसे प्रयासों का पूरा परिणाम मेरे कार्यकाल में या मेरे सहकर्मी न्यायाधीशों के कार्यकाल में दिखाई न दे। लेकिन इससे हमारी प्रतिबद्धता कम नहीं होनी चाहिए।”

मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि देश के कई हाईकोर्ट में इस दिशा में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में इस समय 18 महिला न्यायाधीश कार्यरत हैं, जबकि मद्रास और बॉम्बे हाईकोर्ट में भी लगभग एक दर्जन महिला न्यायाधीश हैं।

उन्होंने जिला न्यायपालिका का भी उल्लेख करते हुए कहा कि वहां महिलाओं की बढ़ती भागीदारी भविष्य की दिशा को स्पष्ट करती है। उनके अनुसार, जिला स्तर पर कार्यरत न्यायिक अधिकारियों में लगभग 36.3 प्रतिशत महिलाएं हैं, जो न्यायपालिका में एक महत्वपूर्ण पीढ़ीगत बदलाव का संकेत है।

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मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जैसे-जैसे अधिक महिलाएं विधि क्षेत्र में आ रही हैं और उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं, वैसे-वैसे न्यायपीठ पर उनकी संख्या बढ़ना स्वाभाविक और आवश्यक है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अभी संतोष करने का समय नहीं है, क्योंकि यह प्रक्रिया अभी अधूरी है।

उन्होंने महिलाओं के विधि क्षेत्र में सफर का जिक्र करते हुए कहा कि लगभग एक सदी पहले औपनिवेशिक शासन के दौरान भारत में महिलाओं को वकालत करने की अनुमति तक नहीं थी। आज जो प्रगति दिखाई देती है, वह लंबे संघर्ष और निरंतर प्रयासों का परिणाम है।

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मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि कानूनी पेशे में महिलाओं को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जैसे देर रात तक काम, पर्याप्त सुविधाओं की कमी, कार्यस्थल पर पूर्वाग्रह और उनके अधिकारों पर सवाल उठाया जाना। इसके बावजूद अनेक महिलाएं अपनी प्रतिभा और समर्पण के बल पर इस क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल कर रही हैं।

उन्होंने कहा कि जब कोई महिला न्यायपीठ पर स्थान प्राप्त करती है, तो यह उन सभी महिलाओं के लिए प्रेरणा का संदेश होता है जो अब भी इन चुनौतियों का सामना कर रही हैं।

इस कार्यक्रम में पूर्व मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमणा और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना तथा न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां भी उपस्थित थे। कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता और महालक्ष्मी पवानी ने अतिथियों का स्वागत किया।

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