डिब्रू-सैखोवा में तेल खनन पर केंद्र की रोक के खिलाफ नई याचिका दायर करेगी ऑयल इंडिया, सुप्रीम कोर्ट ने दी इजाजत

असम के डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान के नीचे तेल और प्राकृतिक गैस निकालने की योजना पर केंद्र सरकार की रोक को अब सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ऑयल इंडिया लिमिटेड (ओआईएल) नई याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कंपनी को अपना पुराना अंतरिम आवेदन वापस लेने और नए सिरे से याचिका दाखिल करने की अनुमति दे दी।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने कंपनी के वकील की दलीलों के बाद यह राहत दी। दरअसल, तकनीकी और प्रक्रियात्मक अड़चनों के कारण कंपनी का अंतरिम आवेदन सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हो पा रहा था।

पुरानी जनहित याचिका में तकनीकी अड़चन

ऑयल इंडिया की ओर से वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख करते हुए इसे बेहद जरूरी बताया और तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि कंपनी ने ऐतिहासिक पर्यावरण मुकदमे—टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलपाद बनाम भारत संघ (1995)—में यह अंतरिम आवेदन दायर किया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने इसे नंबर देने और सूचीबद्ध करने से इनकार कर दिया, क्योंकि इस पुराने मामले में आगे कोई भी अंतरिम अर्जी स्वीकार न करने का पूर्व न्यायिक आदेश प्रभावी है।

इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि पीठ इस तीन दशक पुराने मामले को पूरी तरह समाप्त करना चाहती है। उन्होंने कहा कि पुराने आदेश के चलते रजिस्ट्री अंतरिम आवेदन को सूचीबद्ध नहीं कर सकती, लेकिन यदि कंपनी के पास इस विवाद से जुड़ा कोई नया कारण है, तो वह स्वतंत्र नई याचिका दाखिल कर सकती है, जिस पर अदालत विचार करेगी। इसके बाद वरिष्ठ वकील ने अंतरिम आवेदन वापस लेते हुए नई याचिका दाखिल करने की छूट मांगी, जिसे पीठ ने स्वीकार कर लिया।

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पर्यावरण मंत्रालय के फैसले को चुनौती

ऑयल इंडिया मुख्य रूप से पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और उसकी वन सलाहकार समिति के फैसलों को चुनौती दे रही है। कंपनी ने वन सलाहकार समिति की 4 जुलाई 2024 की बैठक के कार्यवृत्त और उसके आधार पर मंत्रालय द्वारा 2 अगस्त 2024 को जारी उस आदेश को रद्द करने की मांग की है, जिसके तहत असम के तिनसुकिया जिले में 0.069 हेक्टेयर वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग की मंजूरी खारिज कर दी गई थी। याचिका में वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 की धारा 2(1)(ii) के तहत यह मंजूरी देने का निर्देश देने की मांग की गई है।

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कंपनी का तर्क है कि पर्यावरण मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के 26 अप्रैल 2023 के उस आदेश को इस मामले पर गलत तरीके से लागू किया है, जिसमें राष्ट्रीय उद्यानों, वन्यजीव अभयारण्यों और उनके एक किलोमीटर के दायरे में खनन गतिविधियों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया गया था।

कंपनी ने दलील दी है कि एक्सटेंडेड रीच ड्रिलिंग (ईआरडी) तकनीक के जरिए हाइड्रोकार्बन निकालना पारंपरिक खनन के दायरे में नहीं आता। इसके लिए अलग कानूनी और नियामक ढांचा तय है। कंपनी के अनुसार, ड्रिलिंग रिग और अन्य जमीनी ढांचा राष्ट्रीय उद्यान की सीमाओं से पूरी तरह बाहर स्थित है, इसलिए इससे संरक्षित वन क्षेत्र की जमीन पर कोई असर नहीं पड़ता।

परियोजना का महत्व और पिछली मंजूरियां

वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने मामले की महत्ता रेखांकित करते हुए अदालत को बताया कि इस परियोजना के दायरे में आने वाला तेल भंडार देश की कुल पेट्रोलियम जरूरतों के करीब तीन प्रतिशत हिस्से की आपूर्ति कर सकता है।

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कंपनी के प्रस्ताव के मुताबिक, तिनसुकिया वन्यजीव प्रभाग के तहत बागजान पेट्रोलियम माइनिंग लीज क्षेत्र से यह ड्रिलिंग की जानी है। इसके तहत उपकरण जमीन में लगभग 4,000 मीटर गहराई तक लंबवत जाएंगे और फिर क्षैतिज रूप से मुड़कर राष्ट्रीय उद्यान के तल से 3,500 से 4,000 मीटर नीचे मौजूद तेल और गैस भंडारों तक पहुंचेंगे।

ऑयल इंडिया ने अपनी अर्जी में पुरानी मंजूरियों का भी उल्लेख किया है। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति की सिफारिशों के बाद 2017 में ही शर्तों और सुरक्षा मानकों के साथ डिब्रू-सैखोवा के नीचे ईआरडी तकनीक से हाइड्रोकार्बन दोहन की अनुमति दे दी थी। इसके अलावा, जनवरी 2020 में पार्क के आसपास शून्य से 8.7 किलोमीटर तक का इको-सेंसिटिव जोन अधिसूचित किया गया था और मई 2020 में पार्क के नीचे सात स्थानों पर हाइड्रोकार्बन परीक्षण और ड्रिलिंग के लिए पर्यावरणीय मंजूरी भी मिल चुकी थी, हालांकि वन भूमि उपयोग के लिए अलग से मंजूरी मिलना शेष था।

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