झारखंड हाईकोर्ट ने एक पति द्वारा क्रूरता और परित्याग (Desertion) के आधार पर दायर तलाक की अपील को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के उस फैसले की पुष्टि की जिसमें कहा गया था कि विधवा मां और परिवार से अलग रहने के लिए दबाव बनाने के केवल मौखिक आरोप, बिना किसी ठोस सबूत के ‘क्रूरता’ की श्रेणी में नहीं आते। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता पत्नी के खिलाफ दुर्व्यवहार या जानबूझकर घर छोड़ने के ठोस उदाहरण पेश करने में विफल रहा है।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता और प्रतिवादी का विवाह 27 अप्रैल 2008 को हजारीबाग में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। 2010 में इस दंपति को एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। मृतक पिता के स्थान पर अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी कर रहे अपीलकर्ता का आरोप था कि उसकी पत्नी और उसके मायके वाले उस पर अपनी विधवा मां और छोटे भाई-बहनों से अलग रहने का लगातार दबाव बना रहे थे।
पति का आरोप था कि इनकार करने पर पत्नी ने झूठे दहेज मामले में फंसाने और आत्महत्या करने की धमकी दी। अपीलकर्ता के अनुसार, प्रतिवादी 20 फरवरी 2013 को नकदी और गहने लेकर अपने मायके चली गई। इसके बाद, पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(i-a) और (i-b) के तहत हजारीबाग के फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट द्वारा मुकदमे को खारिज करना साक्ष्यों की अनदेखी है। उसका कहना था कि गवाहों (PW-1, PW-2 और PW-3) की गवाही से मानसिक क्रूरता और परित्याग सिद्ध होता है, जिसे पत्नी चुनौती देने के लिए कोई भी गवाह पेश नहीं कर सकी।
वहीं, प्रतिवादी पत्नी ने फैमिली कोर्ट के फैसले का बचाव किया। उसने आरोप लगाया कि शादी में ₹6 लाख सहित पर्याप्त दहेज दिया गया था, लेकिन ससुराल में और अधिक दहेज की मांग और प्रताड़ना जारी रही। उसने तर्क दिया कि उसने घर अपनी मर्जी से नहीं छोड़ा बल्कि उसे जाने के लिए मजबूर किया गया। साथ ही उसने यह भी बताया कि पति अदालती आदेश के बावजूद गुजारा भत्ता (maintenance) का भुगतान नहीं कर रहा है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने स्थापित मिसालों के आधार पर ‘क्रूरता’ और ‘परित्याग’ की कानूनी परिभाषाओं का विस्तृत विश्लेषण किया।
क्रूरता के मुद्दे पर: कोर्ट ने गौर किया कि हालांकि ‘क्रूरता’ की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है, लेकिन यह ऐसा व्यवहार होना चाहिए जो इतना गंभीर हो कि जीवनसाथी के साथ रहना असंभव हो जाए। डॉ. एन.जी. दस्तने बनाम श्रीमती एस. दस्तने मामले का उल्लेख करते हुए बेंच ने कहा:
“अदालत को यह जांचना होता है कि क्या क्रूरता का आरोप ऐसा है जिससे याचिकाकर्ता के मन में उचित आशंका पैदा हो कि प्रतिवादी के साथ रहना उसके लिए हानिकारक या नुकसानदेह होगा।”
अलग रहने के दबाव के आरोप पर हाईकोर्ट ने इसे “अस्पष्ट और सामान्य प्रकृति” का पाया। कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता की मां ने खुद सामने आकर उन आरोपों का समर्थन नहीं किया कि पत्नी उन पर संपत्ति नाम करने का दबाव बना रही थी। दहेज मामले की धमकी पर कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“पत्नी द्वारा दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज कराना अपने आप में क्रूरता नहीं है। कानूनी उपाय खोजना उसका अधिकार है और इसे केवल तब क्रूरता माना जा सकता है जब यह साबित हो जाए कि मामला दुर्भावनापूर्ण और बिना किसी आधार के दर्ज किया गया था।”
परित्याग (Desertion) के मुद्दे पर: कोर्ट ने परित्याग के लिए आवश्यक तत्वों—अलग रहने का तथ्य और वैवाहिक संबंधों को स्थायी रूप से समाप्त करने की मंशा—की जांच की। देबानंद तामुली बनाम काकुमोनी कटकी मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि परित्याग बिना किसी उचित कारण और सहमति के होना चाहिए।
बेंच ने पाया कि पति ने अलग होने के मात्र तीन महीने के भीतर (7 मई 2013) तलाक का मुकदमा दायर कर दिया था, जबकि उसने दाम्पत्य अधिकारों की बहाली (Restitution of Conjugal Rights) के लिए कोई प्रयास नहीं किया।
“महत्वपूर्ण बात यह है कि उसने दाम्पत्य अधिकारों की बहाली की कार्यवाही शुरू नहीं की, जो उसकी मंशा की सत्यता पर संदेह पैदा करती है। अदालत का मानना है कि पति का आचरण किसी गुप्त उद्देश्य से वैवाहिक संबंधों को तोड़ने की दिशा में निर्देशित प्रतीत होता है।”
अंतिम निर्णय
फैमिली कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि न पाते हुए, हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता यह साबित करने में विफल रहा कि संबंध उस स्तर तक बिगड़ गए थे जहां साथ रहना असंभव था।
बेंच ने अपील खारिज करते हुए कहा, “अपीलकर्ता प्रतिवादी द्वारा की गई कथित क्रूरता को साबित करने में विफल रहा है… और चूंकि विद्वान फैमिली कोर्ट ने क्रूरता के दावे को नकारते हुए रिकॉर्ड पर आए साक्ष्यों की उचित सराहना की है, इसलिए कोर्ट का निष्कर्ष त्रुटिपूर्ण नहीं है।”
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: संजीव कुमार पांडे बनाम विभा रानी पांडे
- केस नंबर: एफ.ए. नंबर 178 ऑफ 2023
- बेंच: जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद
- दिनांक: 16 अप्रैल, 2026

