पश्चिम बंगाल चुनाव: मतदाता सूची में 7 लाख नाम जोड़ने के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट की ‘फिशिंग इंक्वायरी’ से इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में चुनावी तैयारियों के बीच मतदाता सूची में कथित तौर पर पांच से सात लाख नए नाम जोड़ने के दावों पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने बिना किसी ठोस आधार के लगाए गए इन आरोपों पर किसी भी तरह की ‘फिशिंग इंक्वायरी’ (अटकलों के आधार पर जांच) करने से साफ इनकार कर दिया।

चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने स्पष्ट किया कि अदालत केवल मीडिया रिपोर्ट्स या अधूरी जानकारी के आधार पर इस तरह की मौखिक दलीलों पर विचार नहीं करेगी।

यह मामला पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आया। वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने अदालत का ध्यान उन मीडिया रिपोर्ट्स की ओर आकर्षित किया, जिनमें दावा किया गया है कि फॉर्म 6 के जरिए राज्य में करीब 5 से 7 लाख नए मतदाता जोड़े गए हैं।

गुरुस्वामी ने तर्क दिया कि कट-ऑफ तारीख के बाद फॉर्म 6 (जो नए मतदाताओं या क्षेत्र बदलने वालों के लिए होता है) के जरिए इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं को शामिल करना नियमों के खिलाफ है। उन्होंने अंदेशा जताया कि इसका आगामी विधानसभा चुनावों के परिणामों पर गहरा असर पड़ सकता है।

जब बेंच ने उनसे पुख्ता जानकारी मांगी, तो उन्होंने स्वीकार किया कि अभी तक अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित नहीं हुई है और उनके पास पर्याप्त विवरण नहीं है। इस पर चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की, “हम इस तरह से फिशिंग इंक्वायरी नहीं कर सकते। यदि आप इसे चुनौती देना चाहते हैं, तो हम देखेंगे, लेकिन इस तरह की मौखिक दलीलों को स्वीकार नहीं किया जाएगा।”

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पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव दो चरणों में—23 अप्रैल और 29 अप्रैल—को होने निर्धारित हैं, जबकि मतगणना 4 मई को होगी। मतदाता सूची की शुद्धता को लेकर चल रहे विवादों के बीच ही सुप्रीम कोर्ट ‘विशेष गहन संशोधन’ (SIR) प्रक्रिया की निगरानी कर रहा है।

पिछले सप्ताह, शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि उन मतदाताओं के नामों को शामिल करने के लिए एक पूरक संशोधित सूची जारी की जाए, जिनके नाम पहले हटा दिए गए थे लेकिन अब अपीलीय न्यायाधिकरणों (Appellate Tribunals) ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया है।

विवादों के त्वरित निपटारे के लिए, कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने 19 ट्रिब्यूनल गठित किए हैं। इन ट्रिब्यूनल्स की अध्यक्षता हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और जजों द्वारा की जा रही है, जो मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ अपीलों पर सुनवाई कर रहे हैं।

13 अप्रैल को दिए गए अपने आदेश में, बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह सुनिश्चित किया कि किसी भी वैध मतदाता का अधिकार न छिपे। कोर्ट ने निर्देश दिया:

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“जहाँ भी अपीलीय न्यायाधिकरण 21 अप्रैल, 2026 या 27 अप्रैल, 2026 (संबंधित चरण के अनुसार) तक अपीलों पर निर्णय लेने में सक्षम हैं, वहां उन आदेशों को लागू करने के लिए पूरक संशोधित मतदाता सूची जारी की जाएगी और मतदान के अधिकार से संबंधित सभी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी की जाएंगी।”

अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि केवल अपील लंबित होने के आधार पर किसी भी व्यक्ति को वोट डालने का अधिकार नहीं मिलेगा। केवल वे ही मतदान कर पाएंगे जिनके पक्ष में निर्धारित समय सीमा तक ट्रिब्यूनल का आदेश आ जाएगा।

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