चार्जशीट के दस्तावेजों पर आरोपी का हक, सुप्रीम कोर्ट का सीबीआई को पूर्व रॉ अधिकारी के साथ गोपनीय फाइलें साझा करने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि चार्जशीट का हिस्सा रहे दस्तावेजों को किसी आरोपी को सौंपने से इनकार करना उसके निष्पक्ष सुनवाई (फेयर ट्रायल) के संवैधानिक अधिकार का हनन है। शीर्ष अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को निर्देश दिया है कि वह ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट (शासकीय गुप्त बात अधिनियम) के तहत मुकदमे का सामना कर रहे सेवानिवृत्त मेजर जनरल और रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) के पूर्व अधिकारी वी के सिंह को अति-गोपनीय दस्तावेजों की टाइप्ड कॉपियां सौंपे।

जस्टिस जे के माहेश्वरी और जस्टिस ए एस चांदुरकर की खंडपीठ ने 18 मई के अपने आदेश में दिल्ली हाईकोर्ट के उस पिछले फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें आरोपी को केवल अदालत में जाकर संवेदनशील दस्तावेजों के निरीक्षण की अनुमति दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश के अनुसार, सीबीआई को दो महीने के भीतर ये दस्तावेज सिंह के बचाव पक्ष को सौंपने होंगे।

अदालत का फैसला और सुरक्षा शर्तें

राष्ट्रीय सुरक्षा और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी शर्तें भी लागू की हैं। सेवानिवृत्त मेजर जनरल को एक महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में एक औपचारिक हलफनामा (अंडरटेकिंग) देना होगा। इसमें उन्हें यह वचन देना होगा कि वे इन संवेदनशील दस्तावेजों को प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक या सोशल मीडिया के किसी भी प्लेटफॉर्म पर साझा, वितरित या प्रकाशित नहीं करेंगे।

सीबीआई ने इन फाइलों को आरोपी के साथ साझा करने का कड़ा विरोध किया था। एजेंसी का तर्क था कि ये दस्तावेज बेहद संवेदनशील हैं और इनके सार्वजनिक होने से देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने मुकदमे के लिए इन दस्तावेजों की प्रासंगिकता पर कोई सवाल नहीं उठाया है। जजों ने कहा कि चूंकि ये दस्तावेज चार्जशीट का हिस्सा हैं और आरोपी के खिलाफ इस्तेमाल किए जा रहे हैं, इसलिए उन्हें इन तक पहुंच न देना बचाव पक्ष के साथ गंभीर अन्याय होगा।

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राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम निष्पक्ष सुनवाई

अदालत ने कहा कि आरोपी के लिए निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू है। राष्ट्रीय सुरक्षा और निष्पक्ष सुनवाई के बीच संतुलन कायम करने के लिए ही सीबीआई के विधि अधिकारी की सहमति से यह बीच का रास्ता निकाला गया है।

क्या है पूरा मामला?

सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी वी के सिंह के खिलाफ यह मामला सितंबर 2007 में दर्ज किया गया था। सीबीआई ने आरोप लगाया था कि सिंह ने अपनी किताब ‘इंडियाज एक्सटर्नल इंटेलिजेंस सीक्रेट्स ऑफ रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’ में देश के महत्वपूर्ण गुप्त रहस्यों का खुलासा किया है।

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इसके बाद, अप्रैल 2008 में जांच एजेंसी ने ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत चार्जशीट दाखिल की। सीबीआई ने ट्रायल कोर्ट से अनुरोध किया था कि इन गोपनीय दस्तावेजों को सीलबंद लिफाफे में ही रखा जाए। इसके जवाब में सिंह ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 207 के तहत एक याचिका दायर की, जो आरोपी को पुलिस रिपोर्ट और मुकदमे से जुड़े जरूरी दस्तावेज मुहैया कराने से संबंधित है।

दशकों पुराना न्यायिक सफर

दस्तावेजों तक पहुंच को लेकर चल रहा यह विवाद पिछले डेढ़ दशक से भी अधिक समय से अदालतों में घूम रहा है। दिसंबर 2009 में, ट्रायल कोर्ट ने पहली बार सीबीआई को निर्देश दिया था कि वह सीलबंद फाइलों की कॉपियां सिंह को सौंपे। हालांकि, कोर्ट ने तब यह शर्त लगाई थी कि ये दस्तावेज केवल उनके रक्षा वकील की व्यक्तिगत कस्टडी में रहेंगे और इन्हें कहीं और सर्कुलेट नहीं किया जाएगा।

सीबीआई ने इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था। पिछले साल सितंबर में, हाईकोर्ट ने इस आदेश में बदलाव करते हुए कहा था कि सिंह केवल ट्रायल कोर्ट में जाकर इन फाइलों का निरीक्षण कर सकते हैं, उन्हें इसकी कॉपियां नहीं दी जा सकतीं। अब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस प्रतिबंधात्मक आदेश को पूरी तरह पलट दिया है और जरूरी सुरक्षा उपायों के साथ सिंह को दस्तावेजों की कॉपियां हासिल करने का अधिकार बहाल कर दिया है।

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