भर्ती में उच्च शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य कार्य अनुभव का विकल्प नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भर्ती नियमों में निर्धारित अनिवार्य कार्य अनुभव (Essential Experience) की जगह उच्च शैक्षणिक योग्यता को आधार नहीं बनाया जा सकता है। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें एक ऐसे उम्मीदवार की नियुक्ति रद्द कर दी गई थी जिसके पास निर्धारित 5 साल का अनुभव नहीं था, भले ही उसने चयन प्रक्रिया में सर्वाधिक अंक प्राप्त किए थे और उसके पास एम.टेक (M.Tech) की डिग्री थी।

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि नियमों में ढील देने की शक्ति (Power of Relaxation) का प्रयोग लिखित कारणों के साथ सचेत रूप से किया जाना चाहिए और इसे केवल नियुक्ति होने के आधार पर मान लेना कानूनी रूप से गलत है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 2016 में हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड द्वारा ‘कंप्यूटर हार्डवेयर इंजीनियर’ के पद के लिए शुरू की गई भर्ती प्रक्रिया से संबंधित है। इसके लिए अनिवार्य योग्यता बी.ई./बी.टेक के साथ “किसी प्रतिष्ठित कंपनी में कंप्यूटर मैन्युफैक्चरिंग/मेंटेनेंस में कम से कम 5 साल का अनुभव” निर्धारित की गई थी। नियमों में यह भी उल्लेख था कि एम.टेक (इलेक्ट्रॉनिक) डिग्री वाले उम्मीदवारों को “वरीयता” (Preference) दी जाएगी।

अपीलकर्ता हिमाक्षी ने 152 अंकों के साथ शीर्ष स्थान प्राप्त किया और उनके पास एम.टेक की डिग्री थी, लेकिन अनुभव केवल एक वर्ष का था। वहीं, राहुल वर्मा ने 143 अंक प्राप्त किए और 6 साल के अनुभव का दावा किया। एक अन्य उम्मीदवार गौरव ने 151 अंक प्राप्त किए थे। बोर्ड द्वारा हिमाक्षी का चयन किए जाने पर राहुल वर्मा ने इसे चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट के सिंगल जज ने शुरुआत में बोर्ड की नियमों में ढील देने की शक्ति का हवाला देते हुए चयन को सही ठहराया था, लेकिन बाद में डिवीजन बेंच ने इसे रद्द कर दिया। डिवीजन बेंच ने पाया कि राहुल वर्मा सहित किसी भी उम्मीदवार ने “प्रतिष्ठित कंपनी” में अनिवार्य 5 साल के अनुभव की शर्त को पूरी तरह से संतुष्ट नहीं किया था।

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पक्षों की दलीलें

सफल उम्मीदवार (हिमाक्षी) की ओर से: वरिष्ठ वकील श्री पी.एस. पटवालिया ने तर्क दिया कि हिमाक्षी सबसे योग्य उम्मीदवार थीं। उन्होंने भर्ती एवं पदोन्नति (R&P) नियमों के नियम 18 का हवाला देते हुए कहा कि बोर्ड के पास योग्यता रखने वाले उम्मीदवारों के लिए अनुभव की शर्तों में ढील देने का अधिकार है। साथ ही, 2016 से उनकी लंबी सेवा और 2019 में उनके नियमितीकरण को देखते हुए मानवीय आधार पर उनकी नियुक्ति को बरकरार रखने की मांग की गई।

असफल उम्मीदवार (राहुल वर्मा) की ओर से: वरिष्ठ वकील श्री एम.सी. ढींगरा ने तर्क दिया कि 5 साल का अनुभव एक अनिवार्य शर्त (Threshold condition) थी। उन्होंने कहा कि उच्च डिग्री की वरीयता केवल उन्हीं उम्मीदवारों पर लागू होती है जो पहले अनिवार्य पात्रता शर्तों को पूरा करते हों। उन्होंने स्वयं को योग्य बताते हुए अपनी नियुक्ति की मांग की।

बोर्ड की ओर से: बोर्ड के वकील ने पूछताछ के दौरान स्वीकार किया कि हिमाक्षी के लिए अनुभव की शर्त में ढील देने के संबंध में चयन प्रक्रिया के दौरान “कोई स्पष्ट निर्णय” या लिखित कारण रिकॉर्ड पर नहीं लिया गया था।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में तीन प्रमुख कानूनी बिंदुओं पर विचार किया:

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1. अनिवार्य बनाम वरीयता योग्यता कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनिवार्य योग्यताएं वे शर्तें हैं जिन्हें तुलनात्मक योग्यता के आधार पर कम नहीं किया जा सकता। एम.टेक डिग्री की वरीयता पर कोर्ट ने कहा:

“वरीयता केवल पात्र और योग्य उम्मीदवारों के दायरे में ही लागू होती है; यह स्वयं पात्रता के दायरे को नहीं बढ़ा सकती… वरीयता देने का चरण तभी आता है जब उम्मीदवार पद के लिए निर्धारित अनिवार्य योग्यताएं पूरी करता हो।”

पीठ ने टिप्पणी की कि अनुभव की कमी को उच्च डिग्री से पूरा करने की अनुमति देना भर्ती नियमों की योजना को उलट देगा और चयन प्रक्रिया में व्यक्तिपरकता (Subjectivity) को बढ़ावा देगा।

2. नियमों में ढील देने की शक्ति का प्रयोग कोर्ट ने जांच की कि क्या बोर्ड ने वास्तव में अनुभव की शर्त में ढील देने के लिए अपनी शक्तियों का प्रयोग किया था। कोर्ट ने पाया कि बोर्ड के पास विवेक के ऐसे प्रयोग का कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं है। रेखा चतुर्वेदी बनाम राजस्थान विश्वविद्यालय मामले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने दोहराया:

“विश्वविद्यालय/चयन समिति को अपनी चयन कार्यवाही में उन कारणों का उल्लेख करना चाहिए जिनके आधार पर किसी उम्मीदवार के पक्ष में नियमों में ढील दी गई है।”

3. मानवीय आधार और लंबी सेवा का तर्क अपीलकर्ता ने अपनी लंबी सेवा के आधार पर सुरक्षा की मांग की थी। हालांकि, कोर्ट ने पूर्व के उदाहरणों (राम स्वरूप बनाम हरियाणा राज्य) को इस मामले से अलग बताया। कोर्ट ने कहा कि उन मामलों में कमी मामूली थी, जबकि यहाँ मामला “पात्रता की जड़” से जुड़ा था। कोर्ट ने कहा:

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“पद पर रहते हुए प्राप्त अनुभव को भर्ती के समय आवश्यक अनिवार्य अनुभव का विकल्प नहीं माना जा सकता… जब बुनियादी पात्रता मानदंड ही अधूरे हों, तो किसी एक उम्मीदवार के पक्ष में मानवीय आधार (Equity) का दावा नहीं किया जा सकता।”

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट के उस फैसले को सही पाया जिसने चयन को अवैध घोषित किया था। कोर्ट ने कहा कि चूंकि पूरी चयन प्रक्रिया ही अनिवार्य पात्रता मानदंडों के उल्लंघन के कारण दूषित थी, इसलिए राहुल वर्मा सहित किसी भी उम्मीदवार को नियुक्ति का निर्देश नहीं दिया जा सकता।

कोर्ट ने बोर्ड को इस पद के लिए नया विज्ञापन जारी करने की छूट दी है और निर्देश दिया है कि नई चयन प्रक्रिया पूरी तरह से भर्ती नियमों (R&P Rules) के अनुसार ही की जाए।

मामले का विवरण:

  • केस का शीर्षक: राहुल वर्मा एवं अन्य बनाम हिमाक्षी एवं अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 5942/2023 (साथ में सिविल अपील संख्या 5943/2023)
  • पीठ: जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
  • दिनांक: 20 अप्रैल, 2026

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