विधानसभा प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे की नियुक्ति पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार और अध्यक्ष से मांगा जवाब

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति और उनके सेवा विस्तार को चुनौती देने वाली याचिका पर राज्य सरकार, विधानसभा अध्यक्ष और विधानसभा सचिवालय से जवाब मांगा है।

जस्टिस आर एस चौहान और जस्टिस डी सी सामंत की अवकाशकालीन पीठ ने सभी प्रतिवादियों को अगली सुनवाई से पहले संक्षिप्त या विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 6 जुलाई की तारीख तय की है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तिथि पर इसे एक नए मामले के रूप में माना जाएगा।

यह आदेश पूर्व विधानसभा सूचना अधिकारी करमेश प्रताप सिंह की याचिका पर आया है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता चेत नारायण सिंह और बालकेश्वर श्रीवास्तव ने पैरवी की। याचिका में 68 वर्षीय प्रदीप कुमार दुबे को भी प्रतिवादी बनाया गया है। याचिका में ‘अधिकार पृच्छा’ (रिट ऑफ को-वारंटो) जारी करने की मांग की गई है, जिसके तहत दुबे से पूछा जाए कि वे किस कानूनी अधिकार के तहत इस पद पर बने हुए हैं।

सवालों के घेरे में नियुक्ति का पूरा घटनाक्रम

याचिका के अनुसार, साल 2009 में की गई दुबे की नियुक्ति और उसके बाद उनका लगातार सेवा विस्तार संवैधानिक नियमों और वैधानिक प्रावधानों का खुला उल्लंघन है। याचिकाकर्ता का कहना है कि विधानसभा सचिवालय (भर्ती और सेवा शर्तें) नियमावली, 1974 के तहत संबंधित श्रेणी के पदों पर नियुक्ति के लिए अधिकतम आयु सीमा 52 वर्ष तय की गई है, जबकि प्रदीप दुबे नियुक्ति के समय ही इस आयु सीमा को पार कर चुके थे।

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याचिका में दिए गए घटनाक्रम के मुताबिक, दुबे ने 13 जनवरी 2009 को उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) ली थी। इसके तुरंत बाद, उसी दिन उन्हें संसदीय कार्य विभाग का प्रमुख सचिव नियुक्त कर दिया गया। इसके महज छह दिन बाद, यानी 19 जनवरी 2009 को उन्हें विधानसभा सचिवालय में प्रमुख सचिव पद का कार्यभार सौंप दिया गया।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि यह पूरी नियुक्ति प्रक्रिया बिना किसी सार्वजनिक विज्ञापन, प्रतिस्पर्धी चयन प्रक्रिया, लोक सेवा आयोग से परामर्श या आवश्यक संवैधानिक मंजूरियों के बिना पूरी की गई। इसके साथ ही याचिका में सेवा नियमों में बाद में किए गए संशोधनों, बार-बार दिए गए सेवा विस्तार और 65 वर्ष की आयु के बाद भी उनके पद पर बने रहने पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

बचाव पक्ष ने याचिका की विचारणीयता पर उठाई आपत्ति

कोर्ट में सुनवाई के दौरान विधानसभा सचिवालय और अध्यक्ष के वकील अभिनव त्रिवेदी ने इस याचिका के विचारणीय होने पर ही प्रारंभिक आपत्ति जताई। उन्होंने दलील दी कि प्रमुख सचिव का पद ऐसा सार्वजनिक पद नहीं है जिसके खिलाफ ‘अधिकार पृच्छा’ (रिट ऑफ को-वारंटो) जारी की जा सके, क्योंकि यह पद किसी संप्रभु (सॉवरेन) कार्य से जुड़ा हुआ नहीं है। उन्होंने कोर्ट से अपनी बात रखने के लिए जवाबी हलफनामा दाखिल करने का समय मांगा।

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दूसरी तरफ, नई दिल्ली से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़े याचिकाकर्ता के वकीलों ने मामले की तात्कालिकता को रेखांकित करते हुए तुरंत सुनवाई की मांग की। उन्होंने अदालत को बताया कि दुबे वर्तमान में भी बिना किसी वैध कानूनी अधिकार के पद पर काबिज हैं और आधिकारिक शक्तियों का उपयोग कर रहे हैं।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों को अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराने के लिए समय दे दिया।

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