अवैध पेड़ कटान और शिकायतकर्ताओं के सामाजिक बहिष्कार पर उत्तराखंड हाईकोर्ट सख्त, राज्य सरकार से दो सप्ताह में मांगा जवाब

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने देहरादून के एक गांव में अवैध रूप से पेड़ काटने की शिकायत करने वाले ग्रामीणों के सामाजिक बहिष्कार के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस पूरे मामले और अब तक की गई कार्रवाई पर दो हफ्ते के भीतर विस्तृत रिपोर्ट सौंपे। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायाधीश सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने शुक्रवार को विकासनगर क्षेत्र के ग्राम सभा तौली से जुड़ी एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मामले को बेहद गंभीर माना। कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि 20 जनवरी को ग्रामीणों द्वारा पहली बार शिकायत दर्ज कराने और उसके बाद प्रशासन को मिली जांच रिपोर्टों पर अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। पीठ ने संबंधित विभागों से इस अवधि में की गई पूरी कार्रवाई का ब्यौरा तलब किया है।

जांच में 54 पेड़ काटने की पुष्टि

यह मामला तब शुरू हुआ जब ग्राम सभा तौली के छह निवासियों ने गांव में बड़े पैमाने पर हरे पेड़ों के कटान के खिलाफ आवाज उठाई और जनवरी में वन विभाग में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद हुई जांच में प्रभागीय वनाधिकारी (DFO) ने पुष्टि की कि गांव में 54 पेड़ों को अवैध रूप से काटा गया था। इसके अलावा, टहनियों की अत्यधिक छंटाई किए जाने के कारण पीपल और आम सहित 29 अन्य पेड़ों को भी भारी नुकसान पहुंचा था।

शिकायतकर्ताओं का सामाजिक बहिष्कार

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि वन विभाग की आधिकारिक रिपोर्ट में नुकसान की पुष्टि होने के बावजूद स्थानीय प्रशासन ने दोषियों के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की। इसके विपरीत, पर्यावरण को बचाने के लिए आवाज उठाने वाले इन छह ग्रामीणों को गांव में प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। याचिका के अनुसार, ग्राम सभा ने एक औपचारिक प्रस्ताव पारित कर शिकायत करने वाले ग्रामीणों पर जुर्माना लगाने और पूरे गांव में उनका सामाजिक बहिष्कार करने का फैसला किया।

इसी सामाजिक उत्पीड़न और प्रशासनिक निष्क्रियता के खिलाफ ग्रामीणों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने अब सरकार और संबंधित प्रशासनिक विभागों को स्पष्ट आदेश दिया है कि वे मामले की शुरुआत से लेकर अब तक की गई कार्रवाई की लिखित जानकारी अदालत के सामने पेश करें।

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