हाईकोर्ट शुरुआती चरण में FIR रद्द करने के लिए धारा 482 के तहत ‘मिनी-ट्रायल’ नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हाईकोर्ट बचाव पक्ष के दस्तावेजों का मूल्यांकन करके शुरुआती चरण में ही आपराधिक जांच को रद्द करने के लिए “मिनी-ट्रायल” नहीं कर सकता। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसने बेंगलुरु में भूमि धोखाधड़ी से संबंधित एक FIR को समाप्त कर दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों की “सुस्थापित सीमाओं का उल्लंघन” किया है।

अदालत ने इस बात पर बल दिया कि यदि आरोप प्रथम दृष्टया किसी संज्ञेय अपराध (cognizable offense) की पुष्टि करते हैं, तो केवल दीवानी उपचार (civil remedy) की उपलब्धता के आधार पर आपराधिक कार्यवाही को नहीं रोका जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद बेंगलुरु के डोड्डागुब्बी गांव के सर्वे नंबर 12 की भूमि से संबंधित है। अपीलकर्ता अक्कम्मा सैम जैकब, जो टोरंटो (कनाडा) में रहने वाली एक NRI हैं, ने 1994 में “एथिना टाउनशिप – स्टेज I” लेआउट में एक आवासीय प्लॉट खरीदा था। शिकायत के अनुसार, 2006 के अंत में उन्हें पता चला कि के.एस. शंकर रेड्डी और के.एस. बालसुंदर रेड्डी सहित कई व्यक्तियों ने कथित तौर पर लेआउट में घुसकर कंपाउंड की दीवारों और बिजली के खंभों को तोड़ दिया था और वहां “सिटी स्केप प्रॉपर्टीज” के बोर्ड लगा दिए थे।

शिकायतकर्ता ने आगे आरोप लगाया कि उन्हें दीवानी कार्यवाही शुरू करने के बहाने हस्ताक्षर और अंगूठे का निशान देने के लिए गुमराह किया गया था। आरोप है कि इन दस्तावेजों का उपयोग उनकी सहमति के बिना के.वी. राजगोपाल रेड्डी के पक्ष में एक “पुष्टिकरण विलेख” (confirmation deed) निष्पादित करने के लिए किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि जाली जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA) और सेल डीड के माध्यम से NRI प्लॉट खरीदारों को उनकी संपत्तियों से वंचित करने की साजिश रची गई थी।

जब स्थानीय पुलिस ने FIR दर्ज करने से इनकार कर दिया, तो शिकायतकर्ता ने बेंगलुरु के मजिस्ट्रेट के समक्ष निजी शिकायत दर्ज कराई। 6 नवंबर 2013 को, मजिस्ट्रेट ने CrPC की धारा 156(3) के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए पुलिस को FIR दर्ज करने और जांच करने का निर्देश दिया।

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हाईकोर्ट का हस्तक्षेप

आरोपी-प्रतिवादियों ने CrPC की धारा 482 के तहत कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया। 28 सितंबर 2016 को, हाईकोर्ट ने यह कहते हुए कार्यवाही रद्द कर दी कि भूमि की पहचान और दावों के बीच ओवरलैप का मामला “तथ्यों का गंभीर विवादित प्रश्न” है जिसका निर्णय दीवानी अदालत द्वारा किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 की धारा 31 के तहत सेल डीड को रद्द नहीं किया जाता, तब तक आपराधिक अदालत कार्यवाही नहीं कर सकती।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने तथ्यों का “व्यापक मूल्यांकन” करके गलती की है, जिसका निर्णय केवल ट्रायल में ही हो सकता है। उन्होंने कहा कि दीवानी और आपराधिक उपचार साथ-साथ चल सकते हैं और जांच के आदेश में हस्तक्षेप करना अनुचित था।

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दूसरी ओर, आरोपी-प्रतिवादियों ने दलील दी कि यह कार्यवाही दीवानी विवाद को आपराधिक रंग देकर दबाव बनाने का एक प्रयास है। उन्होंने दावा किया कि उनके पास पंजीकृत GPA और सेल डीड हैं जिन्हें दीवानी अदालत के आदेश के बिना “जाली” नहीं कहा जा सकता।

अदालत का विश्लेषण और अवलोकन

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट का आधार त्रुटिपूर्ण था। पीठ ने कहा कि धारा 156(3) के चरण में मजिस्ट्रेट को केवल यह देखना होता है कि क्या तथ्य प्रथम दृष्टया किसी संज्ञेय अपराध के तत्वों को दर्शाते हैं।

शुरुआती चरण में ही बचाव पक्ष के दस्तावेजों पर भरोसा करने के लिए हाईकोर्ट की आलोचना करते हुए पीठ ने कहा:

“बचाव सामग्री, जिसमें सेल डीड या अन्य स्वामित्व दस्तावेज शामिल हैं, पर विचार करने में अनिवार्य रूप से तथ्यों के विवादित सवालों पर निर्णय लेना शामिल होगा, जो पूरी तरह से जांच और यदि आवश्यक हो, तो मुकदमे (trial) के दायरे में आते हैं। धारा 156(3) के चरण में ऐसा कोई भी अभ्यास एक मिनी-ट्रायल करने के समान होगा और यह पूरी तरह से अस्वीकार्य होगा।”

अदालत ने आगे उल्लेख किया कि हाईकोर्ट ने शिकायत के आरोपों से परे जाकर “जांच प्रक्रिया को उसके जन्म के समय ही दबा दिया”। नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर (पी) लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले के उदाहरण का हवाला देते हुए अदालत ने दोहराया:

“यदि तथ्य अस्पष्ट हैं और जांच अभी शुरू हुई है, तो हाईकोर्ट ऐसी शक्तियों का प्रयोग करने में सतर्क रहेगा और हाईकोर्ट को जांच एजेंसी को संहिता के प्रावधानों के तहत अपने वैधानिक कर्तव्य के पालन में जांच को आगे बढ़ाने की अनुमति देनी चाहिए।”

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट का यह तर्क गलत था कि आपराधिक अदालत को दीवानी अदालत द्वारा विलेख रद्द किए जाने तक इंतजार करना चाहिए।

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट ने उस चरण में कार्यवाही रद्द करके गलती की जब मजिस्ट्रेट ने केवल FIR दर्ज करने का निर्देश दिया था। परिणामस्वरूप, 28 सितंबर 2016 के हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया गया। FIR और उससे जुड़ी कार्यवाही को बहाल कर दिया गया है और मामला संबंधित पुलिस स्टेशन और मजिस्ट्रेट को कानून के अनुसार आगे बढ़ाने के लिए भेज दिया गया है।

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अदालत ने स्पष्ट किया कि पक्षकार जांच के दौरान अपनी बचाव सामग्री पेश करने के लिए स्वतंत्र हैं और ये टिप्पणियां केवल अपीलों के निपटारे तक सीमित हैं।

केस विवरण

केस का शीर्षक: अक्कम्मा सैम जैकब बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य।

केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2026 (डायरी संख्या 20175/2022)

पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता

दिनांक: 13 अप्रैल, 2026

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