सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी अनुबंध में एक पक्ष दूसरे पक्ष को ‘लायबिलिटी (देयता) से मुक्त रखने’ का आश्वासन देता है, तो यह एक पूर्ण और तत्काल दायित्व (Absolute Obligation) बन जाता है। कोर्ट ने कहा कि इसे केवल एक क्षतिपूर्ति (Indemnity) की तरह नहीं देखा जा सकता जो केवल अंतिम अपीलीय फैसले के बाद ही प्रभावी हो। जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया जिसने एक 2019 के सहमति अवॉर्ड (Consent Award) के निष्पादन को रोक दिया था। कोर्ट ने रॉकलैंड हॉस्पिटल्स के प्रमोटरों को आदेश दिया कि वे 30 दिनों के भीतर वीपीएस हेल्थकेयर (VPS Healthcare) को ₹15,86,17,808 का भुगतान करें।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद वीपीएस हेल्थकेयर और मेडियोर हॉस्पिटल्स (अपीलकर्ता) तथा रॉकलैंड हॉस्पिटल्स के पूर्व प्रमोटरों, प्रभात कुमार श्रीवास्तव और ऋषि श्रीवास्तव (प्रमोटर) के बीच का है। 2016 में वीपीएस ने शेयर खरीद समझौते के माध्यम से रॉकलैंड हॉस्पिटल्स का अधिग्रहण किया था। आपसी विवादों के बाद, पक्षों ने 2 फरवरी, 2019 को एक समझौता किया, जिसे सिंगापुर इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर (SIAC) द्वारा ‘सहमति अवॉर्ड’ में बदल दिया गया।
इस अवॉर्ड की धारा 32(a) के तहत प्रमोटरों ने अर्न्स्ट एंड यंग (EY) के दावों सहित अन्य कानूनी कार्यवाहियों में वीपीएस का बचाव करने की जिम्मेदारी ली थी। प्रमोटरों ने यह भी वचन दिया था कि वे यह ‘सुनिश्चित’ (Ensure) करेंगे कि किसी भी ‘फोरम’ द्वारा वीपीएस से कोई लायबिलिटी वसूल नहीं की जाएगी।
2021 में एक मध्यस्थ न्यायाधिकरण (Arbitral Tribunal) ने ईवाई के पक्ष में ₹10 करोड़ और ब्याज का अवॉर्ड दिया। इस अवॉर्ड के खिलाफ हाईकोर्ट में चुनौती देने के दौरान, हाईकोर्ट ने मेडियोर हॉस्पिटल्स को ₹15.86 करोड़ जमा करने का निर्देश दिया। अपनी संपत्तियों को बचाने के लिए वीपीएस ने यह राशि जमा कर दी और फिर प्रमोटरों से इसे वसूलने के लिए सहमति अवॉर्ड के निष्पादन की मांग की। हालांकि, हाईकोर्ट ने यह कहकर इसे टाल दिया कि प्रमोटरों का दायित्व ‘सर्वोच्च अपीलीय अदालत’ द्वारा फैसले की पुष्टि के बाद ही शुरू होगा।
पक्षों की दलीलें
वीपीएस हेल्थकेयर (अपीलकर्ता) की ओर से: वकील श्री अनिरुद्ध भाटिया ने तर्क दिया कि प्रमोटरों का दायित्व तत्काल था। उन्होंने कहा कि “यह सुनिश्चित करना कि कोई लायबिलिटी वसूल न की जाए” का मतलब है कि प्रमोटरों को हर स्तर पर अपीलकर्ता की रक्षा करनी थी। उन्होंने Khetarpal Amarnath v. Madhukar Pictures मामले का हवाला देते हुए कहा कि जैसे ही मेडियोर को हाईकोर्ट में राशि जमा करने के लिए मजबूर किया गया, प्रमोटरों का दायित्व उत्पन्न हो गया।
प्रमोटरों (प्रतिवादी) की ओर से: वरिष्ठ वकील सुश्री दिया कपूर ने तर्क दिया कि वाणिज्यिक अनुबंधों की व्याख्या सख्त होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि समझौते की शर्तों के अनुसार भुगतान का दायित्व केवल सर्वोच्च अपीलीय अदालत द्वारा पुष्टि के 30 दिनों के बाद ही आता है। उन्होंने Export Credit Guarantee Corp. of India Ltd. v. Garg Sons International मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत को अपनी ओर से अनुबंध में नई शर्तें नहीं जोड़नी चाहिए।
कोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 32(a) का विस्तार से विश्लेषण किया और पाया कि हाईकोर्ट ने केवल अंतिम हिस्से पर ध्यान केंद्रित करके गलती की। कोर्ट ने इस संबंध में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु रखे:
पूर्ण बनाम आकस्मिक दायित्व: पीठ ने कहा कि यद्यपि इस खंड में क्षतिपूर्ति का तत्व है, लेकिन ‘सुनिश्चित करने’ (Ensure) वाली शर्त एक पूर्ण दायित्व को दर्शाती है। कोर्ट ने कहा:
“जहाँ वचन देने वाला एक पूर्ण दायित्व (Absolute Obligation) स्वीकार करता है, उसे वास्तविक नुकसान होने से पहले ही लागू किया जा सकता है, जबकि एक क्षतिपूर्ति अनुबंध (Indemnity Contract) में नुकसान का जोखिम आकस्मिक रहता है। धारा 32(a) के चौथे हिस्से में ‘सुनिश्चित करें’ शब्द… एक पूर्ण दायित्व की ओर संकेत करता है।”
‘फोरम’ की परिभाषा: कोर्ट ने पाया कि अनुबंध में ‘फोरम’ शब्द को बहुत व्यापक रूप से परिभाषित किया गया था, जिसमें कोई भी न्यायाधिकरण या न्यायिक प्राधिकरण शामिल था। इसलिए, मध्यस्थ न्यायाधिकरण का अवॉर्ड और हाईकोर्ट का जमा करने वाला आदेश ‘फोरम द्वारा वसूली’ के दायरे में आता है।
शाब्दिक व्याख्या की प्रधानता: जस्टिस भट्टी ने हाईकोर्ट द्वारा अनुबंध की शर्तों को टालने के लिए ‘व्यावहारिक व्याख्या’ (Purposive Construction) के इस्तेमाल को गलत बताया। कोर्ट के अनुसार:
“वर्तमान मामले में व्यावहारिक व्याख्या का कोई स्थान नहीं है क्योंकि सहमति अवॉर्ड की धारा 32(a) को समग्र रूप से पढ़ने पर एक तत्काल लागू होने वाला दायित्व स्पष्ट होता है। यह मामला एक निश्चित लायबिलिटी के भुगतान का है, न कि ऐसी क्षतिपूर्ति का जो केवल सर्वोच्च अपीलीय अदालत की पुष्टि के बाद परिपक्व होती है।”
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि यदि प्रमोटरों की बात मान ली जाती, तो वे सुप्रीम कोर्ट में अपील ही नहीं करते और इस तरह वीपीएस को कभी भी राहत नहीं मिल पाती।
फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए प्रमोटरों को 30 दिनों के भीतर ₹15,86,17,808 जमा करने का आदेश दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह राशि ईवाई और प्रमोटरों के बीच लंबित विवाद के अंतिम परिणाम के अधीन रहेगी।
केस विवरण:
- केस शीर्षक : वीपीएस हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड और अन्य बनाम प्रभात कुमार श्रीवास्तव और अन्य
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (स्पेशल लीव पिटीशन (सिविल) संख्या 23869/2023 से उद्भूत)
- पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
- दिनांक: 13 अप्रैल, 2026

