एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को रेखांकित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई बरामदगी (Recovery) सार्वजनिक या आम लोगों की पहुंच वाले खुले स्थान से की जाती है, तो उसे आरोपी के विरुद्ध विश्वसनीय साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने कहा कि “संदेह चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह आरोपी को दोषी ठहराने के लिए कानूनी साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकता।”
इस टिप्पणी के साथ उच्चतम न्यायालय ने राजस्थान हाई कोर्ट (जयपुर पीठ) के 2015 के उस आदेश की पुष्टि की है, जिसके तहत सत्र न्यायालय (ट्रायल कोर्ट) द्वारा मनोज कुमार, मनजीत कुमार उर्फ बिल्लू, बलराज उर्फ टीलू और विजय सिंह उर्फ सुंदर को दी गई उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए उन्हें दोषमुक्त (Acquit) कर दिया गया था। इन सभी पर भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 364/120B, 302/120B, 396 और 201 के तहत अपहरण, हत्या और डकैती के आरोप थे।
मामले की पृष्ठभूमि (Factual Background)
इस मामले की शुरुआत 28 अप्रैल 2007 को हुई, जब शिकायतकर्ता पवन कुमार शर्मा (P.W. 1) ने राजस्थान के खेत्री पुलिस स्टेशन में एक लिखित शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के अनुसार, 26 अप्रैल 2007 की शाम लगभग 5:00 बजे, दो युवक उनकी दुकान पर आए और उनके भाई अशोक कुमार शर्मा (मृतक) की बोलेरो गाड़ी को टैक्सी के रूप में किराए पर लेकर लांबी रोड की तरफ गए। अशोक को उसी रात वापस लौटना था, लेकिन वह और गाड़ी दोनों लापता हो गए।
इस गुमशुदगी की रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने प्राथमिकी (FIR Case No. 122/2007) दर्ज कर जांच शुरू की और पांच आरोपियों—मनोज कुमार, मनजीत कुमार उर्फ बिल्लू, बलराज उर्फ टीलू, विजय सिंह उर्फ सुंदर और एक किशोर (जिसका मामला जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के समक्ष अलग से चला)—को गिरफ्तार कर लिया। अभियोजन पक्ष (Prosecution) का दावा था कि बलराज उर्फ टीलू को 28 अप्रैल 2007 को गिरफ्तार किया गया था और उसके प्रकटीकरण बयान (Disclosure Statement) के आधार पर उसी दिन एक सूखे कुएं से मृतक का शव बरामद किया गया था।
सत्र न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के 18 गवाहों और 65 दस्तावेजों के आधार पर 26 जुलाई 2008 को चारों वयस्क आरोपियों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी। हालांकि, अपीलीय स्तर पर राजस्थान हाई कोर्ट ने 30 जनवरी 2015 को इस फैसले को उलट दिया। हाई कोर्ट ने पाया कि परिस्थितियों की कड़ियां आपस में जुड़ी हुई नहीं थीं और विजय सिंह की पहचान भी संदेहास्पद थी। हाई कोर्ट के इसी दोषमुक्ति के फैसले के खिलाफ शिकायतकर्ता और राजस्थान राज्य ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।
दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं (राजस्थान राज्य और शिकायतकर्ता) की ओर से: राज्य की अतिरिक्त अधिवक्ता जनरल (A.A.G.) सुश्री संसृति पाठक और शिकायतकर्ता के वकील श्री के.एल. जंजानी ने तर्क दिया कि अभियोजन ने अपना मामला संदेह से परे साबित किया था। उन्होंने परिस्थितियों की कड़ी पूरी करने के लिए विभिन्न भौतिक वस्तुओं की बरामदगी को मुख्य आधार बनाया:
- मनजीत कुमार उर्फ बिल्लू की निशानदेही पर मृतक का टेप रिकॉर्डर और कलाई घड़ी बरामद होना।
- विजय सिंह उर्फ सुंदर से एक तौलिया बरामद होना।
- मनोज कुमार से बोलेरो गाड़ी के पंजीकरण दस्तावेज मिलना।
- बलराज उर्फ टीलू से मृतक का शव, बोलेरो गाड़ी और एक लाठी बरामद होना।
अपीलकर्ताओं ने दलील दी कि चूंकि मृतक को आखिरी बार आरोपियों (विजय सिंह और किशोर) के साथ देखा गया था, इसलिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 106 के तहत यह साबित करने का दायित्व आरोपियों पर आ जाता है कि मृतक के साथ क्या हुआ था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बरामदगी से पहले ही गिरफ्तारी मेमो में हत्या की धारा (Sec 302) का जोड़ा जाना जांच अधिकारी द्वारा शव को कुएं में देख लेने के कारण स्वाभाविक था। इसके अलावा, शव की बरामदगी के समय स्वतंत्र गवाह के बजाय केवल एक रिश्तेदार (मृतक के चाचा) की उपस्थिति को पूरी बरामदगी को खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
प्रतिवादियों (आरोपियों) की ओर से: आरोपियों के वकील ने हाई कोर्ट के दोषमुक्ति के फैसले का पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि केवल टुकड़ों में हुई बरामदगी से अपराध सिद्ध नहीं होता और संदेह कभी भी सबूत का विकल्प नहीं बन सकता। प्रतिवादियों ने उच्चतम न्यायालय के तुलैश कुमार साहू बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले के फैसले का हवाला दिया, जिसमें सुंदर लाल उर्फ सुंदेरा बनाम मध्य प्रदेश राज्य और सनवंत खान बनाम राजस्थान राज्य के सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा गया था:
“जहां आरोपी के खिलाफ एकमात्र सबूत चोरी की संपत्ति की बरामदगी है, भले ही परिस्थितियां यह दर्शाती हों कि चोरी और हत्या एक ही समय में हुई होगी, फिर भी चोरी की संपत्ति रखने वाले व्यक्ति को ही हत्यारा मान लेना सुरक्षित नहीं है। संदेह कभी भी सबूत का स्थान नहीं ले सकता।”
उच्चतम न्यायालय का विश्लेषण और निष्कर्ष
जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने पीठ की ओर से निर्णय लिखते हुए स्पष्ट किया कि दोषमुक्ति के खिलाफ अपीलों में संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत असाधारण शक्तियों का प्रयोग तभी किया जाना चाहिए जब हाई कोर्ट का दृष्टिकोण पूरी तरह से विकृत (Perverse) या कानूनन त्रुटिपूर्ण हो। मध्य प्रदेश राज्य बनाम पलटन मल्लाह और पंजाब राज्य बनाम केवल कृष्ण का हवाला देते हुए कोर्ट ने साक्ष्यों की त्रुटियों का बारीकी से विश्लेषण किया:
1. शव की संदिग्ध बरामदगी
पीठ ने माना कि हाई कोर्ट ने बलराज उर्फ टीलू की निशानदेही पर शव की बरामदगी को बिल्कुल सही ढंग से संदेहास्पद माना। अदालत ने सवाल उठाया कि जब 28 अप्रैल 2007 को बलराज की गिरफ्तारी के समय पुलिस के पास केवल गुमशुदगी की रिपोर्ट थी, तो उसी दिन तैयार गिरफ्तारी मेमो में पहले से ही धारा 302, 394 और 201 आईपीसी का उल्लेख कैसे कर दिया गया था।
इसके अतिरिक्त, स्वतंत्र गवाह बसंत सिंह (P.W. 5) के बयान से यह खुलासा हुआ कि पुलिस ने शव बरामदगी की कथित तारीख (29 अप्रैल) से पहले, यानी 28 अप्रैल को ही उस कुएं का निरीक्षण कर लिया था। गवाह ने यह भी स्पष्ट किया कि बरामदगी के समय कोई भी आरोपी घटना स्थल पर मौजूद नहीं था।
अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 100(4) के उल्लंघन पर भी गंभीर रुख अपनाया। बरामदगी के समय मौजूद स्वतंत्र गवाह रामअवतार को अभियोजन पक्ष ने गवाही के लिए पेश ही नहीं किया और केवल मृतक के चाचा (P.W. 2) की गवाही पर भरोसा किया। न्यायालय ने कहा:
“…स्वतंत्र गवाहों की आवश्यकता, विशेष रूप से सीआरपीसी की धारा 100(4) के तहत, जांच को विश्वसनीयता प्रदान करने के लिए होती है… रामअवतार, जो एक स्वतंत्र गवाह थे, उन्हें अदालत के समक्ष पेश न करना महत्वपूर्ण गवाह को छिपाने के समान है और यह आरोपी बलराज उर्फ टीलू की निशानदेही पर शव की बरामदगी को संदेहास्पद बनाता है।”
2. सार्वजनिक स्थान से बोलेरो गाड़ी की बरामदगी
मामले में बोलेरो गाड़ी की बरामदगी आरोपी बलराज के प्रत्यक्ष कब्जे से नहीं, बल्कि एक खुले और आम रास्ते से हुई थी। जैकम खान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले की न्यायिक मिसाल का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“ऐसी बरामदगी जो उन स्थानों से की गई हो जो हर किसी के लिए सुलभ थे, उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।”
3. ‘लास्ट सीन टूगेदर’ (अंतिम बार साथ देखे जाने) का सिद्धांत और धारा 106
आरोपी विजय सिंह उर्फ सुंदर पर लागू ‘लास्ट सीन’ सिद्धांत के संबंध में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 अभियोजन पक्ष के प्राथमिक दायित्व को कम नहीं करती; साबित करने का मुख्य भार हमेशा अभियोजन पर ही रहता है। मनोज उर्फ मुन्ना बनाम छत्तीसगढ़ राज्य का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के तहत आरोपी के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष तभी निकाला जा सकता है जब अभियोजन पक्ष अपना मामला संदेह से परे स्थापित करने में पूरी तरह सफल रहा हो।”
कन्हैया लाल बनाम राजस्थान राज्य का उल्लेख करते हुए पीठ ने दोहराया कि “अंतिम बार साथ देखे जाने का साक्ष्य एक कमजोर प्रकार का साक्ष्य है” और बिना अन्य मजबूत पुख्ता सबूतों के केवल इसके आधार पर धारा 302 और 201 के तहत सजा नहीं दी जा सकती।
4. पहचान परेड (TIP) न कराया जाना एक गंभीर चूक
मनजीत कुमार उर्फ बिल्लू से बरामद टेप रिकॉर्डर और कलाई घड़ी की कोई टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) नहीं कराई गई थी। राजस्थान पुलिस रूल्स, 1965 के तहत बरामद वस्तुओं की पहचान सुनिश्चित करने के लिए पहचान परेड कराना अनिवार्य है। थम्मारया बनाम कर्नाटक राज्य का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“इसलिए, जांच अधिकारी द्वारा बरामद वस्तुओं की पहचान परेड (TIP) न कराने की यह गंभीर चूक—विशेष रूप से तब जब अभियोजन का पूरा मामला केवल इन बरामदगियों पर टिका हो—अभियोजन की कहानी के ताने-बाने में ऐसे सुराख कर देती है जिन्हें रफू करना असंभव है।”
इसी तरह, विजय सिंह के घर से बरामद तौलिए को कोर्ट ने अप्रासंगिक माना क्योंकि तौलिया एक सामान्य घरेलू वस्तु है और उस पर खून के कोई निशान या मृतक से जुड़ाव का कोई सबूत नहीं पाया गया था।
5. परिस्थितिजन्य साक्ष्य का मूल सिद्धांत (The Hanumant Rule)
सुप्रीम कोर्ट ने परिस्थितियों के आधार पर सजा देने के लिए शरद बिरधीचंद शारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य और ऐतिहासिक हनुमंत मामले के पांच स्वर्णिम सिद्धांतों को पुनः दोहराया:
“…वे परिस्थितियां जिनसे दोषसिद्धि का निष्कर्ष निकाला जाना है, वे पूरी तरह से स्थापित होनी चाहिए और स्थापित तथ्य केवल आरोपी के दोषी होने की परिकल्पना से मेल खाने चाहिए… परिस्थितियां ऐसी निर्णायक प्रकृति की होनी चाहिए जो आरोपी की बेगुनाही की हर संभावित परिकल्पना को खारिज करती हों। दूसरे शब्दों में, साक्ष्यों की कड़ी इतनी संपूर्ण होनी चाहिए कि आरोपी की बेगुनाही के लिए कोई भी उचित आधार न बचे…”
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि राजस्थान हाई कोर्ट ने साक्ष्यों का सूक्ष्म मूल्यांकन करते हुए बिल्कुल सही निष्कर्ष निकाला था कि परिस्थितियों की कड़ी अधूरी थी। अभियोजन पक्ष पुख्ता साक्ष्यों के अभाव में केवल कमजोर संदेह के सहारे अदालत को “अंधेरे में टटोलने” के लिए छोड़ गया था। अतः, पीठ ने माना कि हाई कोर्ट के दोषमुक्ति के न्यायसंगत फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस कारण नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी अपीलों को खारिज करते हुए चारों आरोपियों को बरी रखने के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी।
मामले का विवरण
- मामले का शीर्षक: पवन कुमार शर्मा बनाम मनोज कुमार एवं अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील संख्या 1353-1355 / 2017
- पीठ: जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
- फैसले की तारीख: 25 मई, 2026

