इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि आपसी वैवाहिक विवाद के कारण पत्नी द्वारा पति के खिलाफ कानूनी मुकदमे दर्ज कराना भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 के तहत ‘उकसाने’ (Instigation) या ‘दुष्प्रेरण’ (Abetment) की श्रेणी में नहीं आता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप को साबित करने के लिए आरोपी की ओर से ‘मेन्स रिया’ (Mens Rea) यानी किसी को जान देने के लिए मजबूर करने की स्पष्ट मंशा का होना अनिवार्य है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला जनपद सहारनपुर के थाना सदर बाजार में 8 अगस्त 2022 को दर्ज हुई एक FIR से जुड़ा है। मृतक के पिता (शिकायतकर्ता) ने आरोप लगाया था कि उनके बेटे की शादी के बाद, आरोपी पत्नी ने उस पर पैतृक संपत्ति में हिस्सा लेने के लिए दबाव डालना शुरू किया।
शिकायतकर्ता के अनुसार, जब बेटे ने मना किया तो पत्नी और उसके रिश्तेदारों ने कथित तौर पर उस पर दबाव बनाया और उसके खिलाफ कई “झूठे मुकदमे” दर्ज कराए। पिता का दावा था कि इन अदालती मामलों के कारण उनका बेटा गहरे तनाव में था, जिसके चलते उसने अपनी नौकरी छोड़ दी और 15 जुलाई 2022 को खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। पुलिस जांच के बाद पत्नी और उसके परिवार के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
पक्षों की दलीलें
आवेदकों के वकील: आवेदकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि वे निर्दोष हैं और उनके खिलाफ दुष्प्रेरण का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। वकील ने स्वीकार किया कि सुसाइड नोट में अदालती मामलों के तनाव का जिक्र था, लेकिन दलील दी कि वैवाहिक विवाद के कारण कानूनी कार्यवाही करना पति की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराने का आधार नहीं हो सकता। उन्होंने जोर दिया कि धारा 306 IPC के तहत ‘उकसाना’ ऐसा होना चाहिए जिसमें मृतक के पास आत्महत्या के अलावा कोई दूसरा विकल्प न बचा हो।
राज्य और शिकायतकर्ता के वकील: सरकारी वकील (AGA) और शिकायतकर्ता के वकील ने इस दलील का विरोध किया। उन्होंने कहा कि आवेदकों ने मृतक को इस कदर प्रताड़ित किया कि उसके पास कोई और रास्ता नहीं बचा था। उन्होंने सुसाइड नोट का हवाला देते हुए कहा कि कई वर्षों तक चले “झूठे मामलों” और “उत्पीड़न” ने मृतक को आत्महत्या जैसा कदम उठाने पर मजबूर किया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
न्यायमूर्ति समीर जैन ने IPC की धारा 107 (दुष्प्रेरण) और धारा 306 के आवश्यक तत्वों का विश्लेषण किया।
‘उकसाने’ (Instigation) पर कोर्ट की टिप्पणी: सुप्रीम कोर्ट के रमेश कुमार बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2001) और लक्ष्मी दास बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2025) मामलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“उकसाने का अर्थ है किसी ‘कृत्य’ को करने के लिए प्रेरित करना, उकसाना या प्रोत्साहित करना… परिणाम के लिए उकसाने की एक निश्चित संभावना का स्पष्ट होना आवश्यक है।”
कोर्ट ने पाया कि वैवाहिक कलह और मुकदमेबाजी को स्वतः ही आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता।
दुर्भावनापूर्ण मंशा (Mens Rea) पर टिप्पणी: कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि आवेदकों की मंशा मृतक को आत्महत्या के लिए उकसाने की थी। कमरुद्दीन दस्तगीर सनादी बनाम कर्नाटक राज्य (2024) मामले का उल्लेख करते हुए जस्टिस समीर जैन ने कहा:
“घरेलू जीवन में विवाद और मतभेद समाज में बहुत सामान्य हैं और आत्महत्या का कदम उठाना पीड़ित की मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है। जब तक आरोपी की ओर से कोई स्पष्ट दोषी मंशा (Guilty Intention) दिखाई न दे, तब तक उसे धारा 306 IPC के तहत अपराधी मानना संभव नहीं है।”
आत्महत्या के विकल्प पर विचार: कोर्ट ने आगे कहा कि भले ही मृतक कानूनी मामलों के कारण तनाव में था, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि उसके पास आत्महत्या के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा था। कोर्ट ने इसके लिए अमलेंदु पाल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2010) के फैसले का संदर्भ दिया।
न्यायालय का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया धारा 306 IPC का अपराध नहीं बनता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जांच अधिकारी और निचली अदालत ने चार्जशीट दाखिल करने और संज्ञान लेने में “यांत्रिक तरीके” (Routine Manner) से काम किया।
परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने दोनों आवेदनों को स्वीकार करते हुए सहारनपुर की सीजेएम अदालत में लंबित आपराधिक मामलों की कार्यवाही और 20 नवंबर 2023 व 7 जनवरी 2024 की चार्जशीट को रद्द कर दिया।
केस का विवरण:
- केस का शीर्षक: मेघा खत्री और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस नंबर: एप्लीकेशन U/S 482 नंबर 6530 / 2024 और नंबर 6991 / 2024
- बेंच: न्यायमूर्ति समीर जैन
- तारीख: 6 अप्रैल, 2026

