यतिन ओझा की अवमानना याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा: न्यायिक गरिमा और सीनियर एडवोकेट के दर्जे पर छिड़ी कानूनी बहस

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन (GHCAA) के अध्यक्ष यतिन ओझा की उस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें उन्होंने राज्य न्यायपालिका के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी के मामले में हाईकोर्ट द्वारा अपनी सजा और दोषसिद्धि को चुनौती दी थी।

जस्टिस जे के माहेश्वरी और जस्टिस ए एस चंदुरकर की बेंच ने ओझा की ओर से पेश हुए दिग्गज वकीलों—के के वेणुगोपाल, कपिल सिब्बल, अभिषेक सिंघवी और अरविंद दातार—की दलीलें सुनने के बाद यह निर्णय लिया। गुजरात हाईकोर्ट की ओर से सीनियर एडवोकेट विजय हंसारिया ने पक्ष रखा।

यह पूरा मामला गुजरात हाईकोर्ट के 6 अक्टूबर 2020 के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें ओझा को अदालत की अवमानना का दोषी पाया गया था। हाईकोर्ट ने उन्हें ‘अदालत की कार्यवाही समाप्त होने तक’ (till the rising of the court) की सजा सुनाई थी और ₹2,000 का जुर्माना लगाया था। जुर्माना न भरने की स्थिति में उन्हें दो महीने के साधारण कारावास की सजा भुगतनी पड़ती। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस सजा के अमल पर रोक लगा दी थी।

यतिन ओझा और न्यायपालिका के बीच विवाद पुराना है। साल 2020 में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान गुजरात हाईकोर्ट को “जुआड़ियों का अड्डा” कहने के बाद उनसे ‘सीनियर एडवोकेट’ का दर्जा छीन लिया गया था।

अक्टूबर 2021 में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए ओझा का सीनियर गाउन बहाल कर दिया था। उस समय शीर्ष अदालत ने इसे ओझा के लिए “एक और आखिरी मौका” बताया था और 1 जनवरी 2022 से दो साल की प्रोबेशन अवधि तय की थी।

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सीनियर दर्जा बहाल रखने की राह में अप्रैल 2024 में एक बड़ी बाधा आई। गुजरात हाईकोर्ट की फुल कोर्ट ने ओझा के खिलाफ कदाचार की एक नई घटना के बाद उनका ‘सीनियर एडवोकेट’ पद वापस लेने का संकल्प पारित किया। इसे ओझा और न्यायपालिका के बीच दशकों पुराने टकराव की “छठी घटना” के रूप में देखा गया।

दस्तावेजों के अनुसार, 9 अप्रैल 2024 को एक रिट याचिका की सुनवाई के दौरान ओझा ने कथित तौर पर पीठासीन जज पर “फोरम शॉपिंग” का आरोप लगाया था। हाईकोर्ट की फुल कोर्ट ने कार्यवाही की वीडियो क्लिप देखने के बाद पाया कि ओझा बिना किसी ब्रीफिंग काउंसिल या औपचारिक पावर ऑफ अपीयरेंस के अदालत में पेश हुए थे।

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15 अप्रैल 2024 के अपने प्रस्ताव में फुल कोर्ट ने कहा कि ओझा का व्यवहार एक सीनियर वकील के अनुरूप नहीं था और उनकी टिप्पणियां “अदालत पर दबाव बनाने” के इरादे से की गई थीं।

मंगलवार की सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने बेंच से इस लंबे विवाद को शांत करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि ओझा अपनी टिप्पणियों के लिए कई बार बिना शर्त माफी मांग चुके हैं।

सिब्बल ने दलील दी, “मैं दो साल पांच महीने से अपने (सीनियर) गाउन के बिना हूं। आप लोगों ने वीडियो देखा है, उसमें ऐसा कुछ नहीं है। उन्हें पहले ही सजा मिल चुकी है। अब आपको यह तय करना है कि क्या इतना काफी नहीं है? उन्होंने पहले ही खेद व्यक्त कर दिया है।”

डॉ. अभिषेक सिंघवी ने भी इस रुख का समर्थन करते हुए मामले को समाप्त करने पर जोर दिया। सिंघवी ने कहा, “आज उनकी सजा पूरी हो चुकी है, उन्हें कुछ समय के लिए एक सामान्य वकील का जीवन जीने का अधिकार है। आपके पास उन्हें दंडित करने की शक्ति है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्होंने सबक नहीं सीखा होगा। अब इस मामले को खत्म करने का समय आ गया है।”

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गुजरात हाईकोर्ट की ओर से पेश विजय हंसारिया ने तर्क दिया कि यह मुद्दा एक संस्था के रूप में न्यायपालिका की अखंडता से जुड़ा है, इसलिए हाईकोर्ट की कार्रवाई उचित थी।

दिसंबर 2025 में 19वीं बार GHCAA के अध्यक्ष चुने गए यतिन ओझा को अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार है, जो यह तय करेगा कि उनकी दोषसिद्धि बरकरार रहेगी या उन्हें राहत मिलेगी।

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