प्रदर्शन का अधिकार का यह अर्थ नही की जहां मन हुआ वहाँ प्रदर्शन करने लगे: सुप्रीम कोर्ट

दिल्ली के शाहीन बाग में सीएए के विरोध में हुए प्रदर्शन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले फैसले पर पुनर्विचार करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया है। जस्टिस संजय किशन कौल, और जस्टिस अनिरुद्ध बोस व जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने कहा कि विरोध का अधिकार कभी भी और कहीं भी नही हो सकता। 

सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में दिल्ली के शाहीनबाग में नागरिकता विरोधी कानून के विरोध प्रदर्शन को लेकर समीक्षा याचिका को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट में पिछले वर्ष 12 कार्यकर्ताओं ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी। 

जस्टिस एस के अतुल की तीन जजों की पीठ ने कहा कि विरोध का अधिकार कभी भी और हर जगह नही हो सकता। कुछ सहज विरोध हो सकते हैं।

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लेकिन लंबे वक्त तक असंतोष और विरोध के मामलों में सार्वजनिक स्थान पर दूसरे के अधिकारों को प्रभावित करता है। तीन सदस्यीय पीठ ने दोहराया कि विरोध प्रदर्शनों के लिए सार्वजनिक स्थानों पर कब्जा नही किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने अक्टूबर 2020 के फैसले में कहा था कि इस तरह के विरोध प्रदर्शन स्वीकार नही है।

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