महाराष्ट्र में 5% मुस्लिम आरक्षण खत्म करने पर बॉम्बे हाईकोर्ट सख्त, राज्य सरकार से मांगा जवाब

बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को महाराष्ट्र सरकार को एक नोटिस जारी कर उस फैसले पर स्पष्टीकरण मांगा है, जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में मिलने वाले पांच प्रतिशत आरक्षण को रद्द कर दिया गया था। जस्टिस आर. आई. चागला और जस्टिस अद्वैत सेठना की खंडपीठ ने इस मामले में सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए तीन सप्ताह का समय देते हुए हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।

यह कानूनी विवाद 17 फरवरी को समाज कल्याण और विशेष सहायता विभाग द्वारा जारी एक सरकारी प्रस्ताव (GR) के बाद शुरू हुआ। इस प्रस्ताव के जरिए उन सभी पिछले आदेशों और अध्यादेशों को प्रभावी रूप से रद्द कर दिया गया था, जो ‘विशेष पिछड़ा वर्ग (A)’ के तहत आने वाले सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े मुस्लिम समूहों को 5% आरक्षण प्रदान करते थे।

मुस्लिम आरक्षण का यह मुद्दा जुलाई 2014 से चला आ रहा है। उस समय की कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने मराठा समुदाय के लिए 16% और मुस्लिम समुदाय के लिए 5% आरक्षण की घोषणा की थी। हालांकि मराठा आरक्षण को शुरुआत में कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन हाईकोर्ट ने पहले के एक आदेश में नौकरियों में आरक्षण पर रोक लगाते हुए भी शिक्षा के क्षेत्र में मुस्लिमों के लिए 5% कोटा बरकरार रखने की अनुमति दी थी।

17 फरवरी के नए सरकारी प्रस्ताव ने इन सभी पुराने सर्कुलर को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही, विशेष पिछड़ा वर्ग के तहत मुस्लिमों को जाति और नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाण पत्र जारी करना भी बंद कर दिया गया है, जिसे अब अदालत में चुनौती दी गई है।

अधिवक्ता सैयद एजाज अब्बास नकवी द्वारा दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि सरकार का यह कदम असंवैधानिक है और अल्पसंख्यक समुदाय के हितों के खिलाफ है। याचिका में इस फैसले को “नस्लीय भेदभाव” करार देते हुए कहा गया है कि आरक्षण खत्म करने के पीछे सरकार के पास कोई ठोस या तार्किक आधार नहीं है।

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याचिका में कहा गया, “प्रतिवादी (महाराष्ट्र सरकार) अल्पसंख्यक समुदाय यानी मुस्लिम समुदाय के व्यक्तियों के साथ भेदभाव कर रही है। यह संविधान में निहित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।” याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि प्रमाण पत्र जारी करना बंद करके सरकार ने उन अवसरों को भी छीन लिया है जो पहले न्यायिक और कार्यकारी प्रक्रिया के माध्यम से सुरक्षित किए गए थे।

हाईकोर्ट ने अब गेंद राज्य सरकार के पाले में डाल दी है और 17 फरवरी के प्रस्ताव के पीछे के तर्क को स्पष्ट करने को कहा है। सरकार द्वारा हलफनामा दायर किए जाने के बाद इस मामले की अगली सुनवाई 4 मई को होगी।

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