लाल किला बम विस्फोट मामले के कथित सह-साजिशकर्ता जासिर बिलाल वानी को दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने वानी की डिफ़ॉल्ट ज़मानत की मांग करने वाली याचिका मंगलवार को ख़ारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि नए आपराधिक कानूनों के लागू होने के बावजूद आतंकवाद रोधी कानून के तहत जांच की वैधानिक समय-सीमा प्रभावी बनी रहेगी और केवल तकनीकी आधार पर 90 दिनों के बाद आरोपी को डिफ़ॉल्ट ज़मानत का अधिकार नहीं मिल जाता।
कानूनी प्रावधानों पर अदालत का रुख
जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस विकास महाजन की पीठ ने ट्रायल कोर्ट के 30 मार्च के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें वानी की अर्ज़ी ख़ारिज कर दी गई थी। वानी ने तर्क दिया था कि जांच की निर्धारित अवधि समाप्त हो चुकी है और गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा 43D में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 187 का स्पष्ट उल्लेख न होने के कारण वह डिफ़ॉल्ट ज़मानत का हकदार है।
इस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जनरल क्लॉज़ेज एक्ट की धारा 8(1) के तहत, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 167 के पुराने संदर्भों को बीएनएसएस की धारा 187 के समकक्ष ही माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि हालांकि वानी डिफ़ॉल्ट ज़मानत का हक़दार नहीं है, लेकिन वह कानून के तहत उपलब्ध अन्य कानूनी विकल्पों का उपयोग करने के लिए स्वतंत्र है। मामले का विस्तृत फैसला अभी आना बाकी है।
तकनीकी सहायता और आतंकी मॉड्यूल से संबंध
जम्मू-कश्मीर के कुलगाम स्थित गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज लेवोदरा के छात्र जासिर बिलाल वानी को शुरुआती दौर में अनंतनाग जिले के काज़ीगुंड से उसके चाचा के साथ हिरासत में लिया गया था। बाद में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने उसे औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर पिछले साल नवंबर में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंप दिया था।
एनआईए के अनुसार, वानी ने विस्फोट से पहले ड्रोन में संशोधन करने और रॉकेट बनाने का प्रयास करके आतंकी मॉड्यूल को तकनीकी मदद पहुंचाई थी। जांच रिकॉर्ड के मुताबिक, वानी पेशे से डॉक्टर आदिल राथर और मुज़फ़्फ़र राथर का पड़ोसी था, जो इस साजिश में शामिल बताए जाते हैं। अधिकारियों के अनुसार, मुज़फ़्फ़र राथर फिलहाल अफ़गानिस्तान में मौजूद है, जबकि उसके भाई आदिल राथर को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से गिरफ्तार किया गया था।

