इंडियाबुल्स मामले में सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: ईडी के सभी 6 आरोपों की स्वतंत्र जांच करेगी सीबीआई

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को निर्देश दिया कि वह इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (आईएचएफएल) और उससे जुड़ी कंपनियों के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा उठाए गए सभी छह वित्तीय अनियमितता के आरोपों की स्वतंत्र जांच करे। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सीबीआई को निर्देश दिया कि वह स्थानीय पुलिस की पिछली रिपोर्ट को दरकिनार करते हुए शिकायत के सभी पहलुओं पर एक व्यापक रिपोर्ट अदालत को सौंपे।

मुंबई अदालत के लिए दो हफ्ते की समयसीमा और सीबीआई जांच के निर्देश

अदालत का यह निर्देश ईडी की शिकायत में शामिल दो अलग-अलग जांच पहलुओं से संबंधित है। इनमें से पांच आरोपों की जांच पहले दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) कर चुकी थी। ईओडब्ल्यू ने अपनी जांच में कंपनी को क्लीन चिट देते हुए आगे की कार्रवाई को गैर-जरूरी बताया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की इस राय और रिपोर्ट को खारिज करते हुए सीबीआई को निर्देश दिया कि वह इन पांचों मामलों की नए सिरे से स्वतंत्र जांच करे।

वहीं, छठवां मामला 1,575 करोड़ रुपये की कथित रकम की हेरफेर (रूटिंग) से जुड़ा है। जांच एजेंसियों की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू ने पीठ को बताया कि सीबीआई ने मुंबई स्थित विशेष पीएमएलए (धन शोधन निवारण अधिनियम) अदालत में आगे की जांच की अनुमति मांगने के लिए आवेदन दाखिल किया है। शीर्ष अदालत ने मुंबई की विशेष अदालत को आदेश दिया कि वह 24 अगस्त को याचिका पर सुनवाई शुरू होने के बाद दो सप्ताह के भीतर इस पर फैसला सुनाए। इसके बाद सीबीआई को अपनी प्रगति रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करनी होगी।

1,693 करोड़ रुपये के लोन और शेयर हेरफेर का गंभीर आरोप

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यह पूरा मामला गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) ‘सिटीजन व्हिसलब्लोअर फोरम’ की याचिका पर आया है, जिसकी पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण कर रहे हैं। एनजीओ ने दिल्ली हाईकोर्ट के 2 फरवरी 2024 के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें हाउसिंग फाइनेंस कंपनी और उसके पूर्व प्रवर्तकों के खिलाफ जांच की मांग को खारिज कर दिया गया था।

याचिका के अनुसार, इंडियाबुल्स और उसके पूर्व प्रवर्तकों ने बड़े कॉरपोरेट समूहों से जुड़ी संस्थाओं को संदिग्ध ऋण दिए। इसके बाद इस धनराशि को प्रवर्तकों के स्वामित्व वाली कंपनियों में वापस घुमाया गया, जिससे उनकी व्यक्तिगत संपत्ति में इजाफा हुआ।

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अदालत में सुनवाई के दौरान सामने आए मुख्य आरोपों में शामिल हैं:

  • एमेरिकॉर्प ग्रुप की इकाइयों को दिए गए लगभग 1,693 करोड़ रुपये के ऋण, जिन्हें कथित रूप से इंडियाबुल्स की कंपनियों के शेयरों में वापस निवेश किया गया ताकि शेयर कीमतों में हेरफेर कर अनुचित लाभ कमाया जा सके।
  • पैलैस रॉयल प्रोजेक्ट से जुड़े संदिग्ध लेन-देन और धन की हेराफेरी।
  • लोन की सिस्टमैटिक एवरग्रीनिंग (पुराने कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज देना), आपराधिक साजिश और सार्वजनिक धन की धोखाधड़ी।

अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने पीठ के समक्ष जोर देकर कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के दिशानिर्देशों के अनुसार 50 करोड़ रुपये से अधिक के बैंकिंग धोखाधड़ी के मामलों की जांच केंद्रीय एजेंसी सीबीआई द्वारा की जानी अनिवार्य है।

जांच एजेंसियों की निष्क्रियता पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

इससे पहले की सुनवाइयों में सुप्रीम कोर्ट ने नियामक और जांच अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गहरा असंतोष व्यक्त किया था। 28 जुलाई को सुनवाई के दौरान पीठ ने सीबीआई और दिल्ली पुलिस की ईओडब्ल्यू द्वारा कोई कदम न उठाए जाने पर कड़ी फटकार लगाई थी। अदालत ने उनकी चुप्पी को “चौंकाने वाला” करार देते हुए कहा था कि यह प्रथम दृष्टया “क्विड प्रो क्वो” (सांठगांठ या लेन-देन) का मामला प्रतीत होता है।

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इससे पूर्व, 19 नवंबर 2025 को भी अदालत ने आईएचएफएल के खिलाफ लगे आरोपों की जांच में सीबीआई और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की हिचकिचाहट पर सवाल उठाए थे। उस समय कोर्ट ने सीबीआई निदेशक को सेबी, गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) और ईडी के अधिकारियों के साथ संयुक्त बैठक करने के निर्देश दिए थे। पीठ ने कंपनी के कई अपराधों को कंपाउंड करने (समझौता करने) के लिए कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय को भी फटकार लगाई थी और अपने अधिकार क्षेत्र को लेकर सेबी के दोहरे रवैये की आलोचना की थी।

इसके अलावा, पिछले साल 17 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई निदेशक को एक सप्ताह के भीतर नियमित मामले दर्ज करने पर अंतिम निर्णय लेने और नया अनुपालन हलफनामा पेश करने का निर्देश दिया था।

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