शादी का वादा शुरू से झूठा साबित न हो तो सहमति से बने संबंध को रेप नहीं माना जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केस रद्द किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस के एक पूर्व इंस्पेक्टर के खिलाफ रेप और अन्य धाराओं में चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। जस्टिस मदन पाल सिंह ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से दोनों के बीच संबंध सहमति से बने दिखाई देते हैं और यह साबित नहीं होता कि शादी का वादा शुरुआत से ही झूठा था। कोर्ट ने माना कि ऐसी स्थिति में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

मामले में आवेदक अमित कुमार ने 18 जुलाई 2020 की चार्जशीट और उससे जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी। उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 376, 323, 504 और 506 के साथ आईटी एक्ट की धारा 67(A) के तहत मामला दर्ज था।

मामले की पृष्ठभूमि

एफआईआर 8 जनवरी 2020 को दर्ज की गई थी। अभियोजन के मुताबिक, शिकायतकर्ता महिला अमित कुमार को वर्ष 2013 से जानती थी, जब वह कोसी कलां, मथुरा में एसएचओ के पद पर तैनात था।

महिला का आरोप था कि बाद में अमित कुमार ने उससे शादी का प्रस्ताव दिया, अपनी पहले से हो चुकी शादी की बात छिपाई और वर्ष 2019 में उसे वाराणसी बुलाया।

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि होटल में उसे नशीला पदार्थ मिला पेय दिया गया, जिसके बाद उसकी मर्जी के बिना शारीरिक संबंध बनाए गए और आपत्तिजनक फोटो तथा वीडियो भी बनाए गए। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि इन्हीं फोटो और वीडियो के जरिए उसे ब्लैकमेल कर आगे भी शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया।

उसका कहना था कि वह गर्भवती भी हुई और बाद में उसकी गर्भावस्था समाप्त कराई गई। महिला ने सीआरपीसी की धारा 161 और 164 के तहत दर्ज अपने बयानों में भी इन आरोपों को दोहराया था।

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आवेदक की दलील

अमित कुमार की ओर से कहा गया कि दोनों के बीच संबंध पूरी तरह सहमति से थे। महिला अपनी मर्जी से वाराणसी आई, उसके साथ होटल में रही और इसके बाद भी संपर्क में बनी रही।

आवेदक ने रिकॉर्ड पर मौजूद तस्वीरों और व्हाट्सऐप चैट का हवाला देते हुए कहा कि दोनों एक रिश्ते में थे और महिला उसके साथ अपनी इच्छा से थी।

यह भी दलील दी गई कि शादी का वादा झूठा नहीं था। आवेदक के मुताबिक, उसकी पहली पत्नी से वैवाहिक संबंध खराब हो चुके थे और उसने तलाक की कार्यवाही शुरू कर दी थी। बाद में दिसंबर 2023 में उसे तलाक की डिक्री भी मिल गई।

उसकी ओर से यह भी कहा गया कि व्हाट्सऐप चैट से पता चलता है कि शिकायतकर्ता को उसकी पहली शादी के बारे में जानकारी थी और वह तलाक होने तक इंतजार करने के लिए तैयार थी।

ब्लैकमेल के आरोप पर आवेदक ने कहा कि जांच के दौरान ऐसा कोई कथित अश्लील फोटो या वीडियो बरामद नहीं हुआ, जिसे केस डायरी का हिस्सा बनाया गया हो।

वहीं राज्य और शिकायतकर्ता की ओर से याचिका का विरोध किया गया। उनका कहना था कि आवेदक ने शादी का झूठा वादा कर महिला को धोखा दिया, अपनी पहली शादी छिपाई और उसी आधार पर बार-बार शारीरिक संबंध बनाए।

झूठे वादे और वादा पूरा न होने में अंतर

हाईकोर्ट ने इस सवाल पर विस्तार से विचार किया कि शादी का ऐसा झूठा वादा, जो शुरुआत से ही पूरा करने की नीयत के बिना किया गया हो, और बाद में शादी न हो पाने की स्थिति में क्या अंतर है।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रमोद सूर्यभान पवार बनाम महाराष्ट्र राज्य और दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य सहित कई फैसलों का उल्लेख किया।

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कोर्ट ने कहा कि शादी के वादे के आधार पर रेप का मामला तभी बन सकता है, जब यह साबित हो कि आरोपी ने शुरुआत से ही शादी करने का कोई इरादा नहीं रखा था और महिला की सहमति उसी झूठे वादे के कारण मिली थी।

हाईकोर्ट ने कहा:

“सहमति से बना शारीरिक संबंध और उसके बाद शादी से इनकार, अपने आप आरोपी को रेप के लिए जिम्मेदार नहीं बनाता।”

कोर्ट ने कहा कि अभियोजन को यह साबित करना जरूरी है कि शादी का वादा शुरू से ही झूठा था, धोखा देने की नीयत से किया गया था और महिला ने केवल उसी वादे के कारण शारीरिक संबंध के लिए सहमति दी थी।

कोर्ट ने संबंध को सहमति से बना माना

हाईकोर्ट ने एफआईआर, महिला के बयानों, तस्वीरों और व्हाट्सऐप चैट का परीक्षण किया।

कोर्ट ने नोट किया कि शिकायतकर्ता करीब 27 वर्ष की शिक्षित महिला थी, वह आवेदक को वर्ष 2013 से जानती थी और सितंबर 2019 में वाराणसी गई थी।

कोर्ट ने दोनों के बीच लगातार संपर्क, तस्वीरों और व्हाट्सऐप चैट को भी महत्व दिया।

कोर्ट ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि आवेदक ने शिकायतकर्ता से शादी करने से इनकार कर दिया था।

व्हाट्सऐप चैट का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि इनसे यह भी सामने आता है कि महिला को आवेदक की पहली शादी की जानकारी थी और वह तलाक होने तक इंतजार करने के लिए तैयार थी।

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अश्लील फोटो और वीडियो के जरिए ब्लैकमेल के आरोप पर कोर्ट ने कहा कि न तो शिकायतकर्ता की ओर से ऐसे फोटो या वीडियो कोर्ट के सामने पेश किए गए और न ही जांच अधिकारी ने जांच के दौरान उन्हें बरामद किया।

अंत में कोर्ट ने कहा:

“इन तथ्यों से इस कोर्ट के पास यह संदेह करने की कोई गुंजाइश नहीं है कि शिकायतकर्ता आवेदक के साथ अपनी स्वतंत्र इच्छा से थी और दोनों के बीच स्थापित संबंध पूरी तरह सहमति से बने थे।”

पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द

हाईकोर्ट ने कहा कि आवेदक के खिलाफ आईपीसी की धारा 376, 323 और 504 तथा आईटी एक्ट की धारा 67(A) के तहत अपराध नहीं बनता।

कोर्ट ने कहा कि जब तथ्यों और परिस्थितियों में आपराधिक दायित्व ही नहीं बनता, तब कार्यवाही जारी रखना कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने 18 जुलाई 2020 की चार्जशीट और क्रिमिनल केस नंबर 11358 ऑफ 2020 की पूरी कार्यवाही रद्द कर दी। यह मामला केस क्राइम नंबर 02 ऑफ 2020 से संबंधित था, जिसमें आईपीसी की धारा 376, 323, 504 और 506 तथा आईटी एक्ट की धारा 67(A) लगाई गई थी।

केस टाइटल: अमित कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
केस नंबर: Application U/S 482 Cr.P.C. No. 15551 of 2020
बेंच: जस्टिस मदन पाल सिंह
तारीख: 30 सितंबर 2026

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