इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि पत्नी के भरण-पोषण का कानूनी दायित्व पति की मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होता है। हाईकोर्ट के अनुसार, विशिष्ट परिस्थितियों में एक विधवा बहू अपने ससुर से भरण-पोषण की मांग करने की कानूनी रूप से हकदार है।
जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्य वीर सिंह की खंडपीठ ने अकुल रस्तोगी नामक व्यक्ति द्वारा दायर एक अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पति का अपनी पत्नी के प्रति प्राथमिक दायित्व उसकी मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति और पारिवारिक जिम्मेदारियों तक विस्तारित होता है।
17 मार्च के अपने आदेश में, हाईकोर्ट ने पति से पिता (ससुर) को भरण-पोषण के दायित्वों के हस्तांतरण को स्पष्ट किया। खंडपीठ ने कहा कि हालांकि कानून आमतौर पर दोनों पति-पत्नी के जीवित रहते हुए भरण-पोषण की बात करता है—अक्सर अलगाव के मामलों में—लेकिन विधवा होने के बाद भी पत्नी को मिलने वाली सुरक्षा उतनी ही मजबूत रहती है।
हाईकोर्ट ने कहा, “यह अच्छी तरह से स्थापित है कि एक पति अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य है। यह स्थिति उन परिस्थितियों से निकली है जहां पति-पत्नी अलग हो गए हैं और पत्नी ने आपराधिक पक्ष या हिंदू कानून के भरण-पोषण प्रावधानों के तहत भरण-पोषण की मांग की है।”
अदालत ने आगे नोट किया: “इतना ही नहीं, पति का पत्नी के भरण-पोषण का यह दायित्व पति की मृत्यु के बाद भी जुड़ा रहता है, जिससे विधवा अपने ससुर से भरण-पोषण का दावा कर सकती है।”
यह निर्णय हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम (Hindu Adoption and Maintenance Act) पर आधारित है, जो उन विशिष्ट परिस्थितियों को रेखांकित करता है जिनके तहत ससुर अपनी बहू के भरण-पोषण के लिए उत्तरदायी होता है।
अधिनियम के अनुसार, एक विधवा बहू भरण-पोषण का दावा कर सकती है यदि वह निम्नलिखित शर्तों को पूरा करती है:
- स्वयं के भरण-पोषण में असमर्थता: वह अपनी कमाई या संपत्ति से अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हो।
- अन्य स्रोतों की अनुपलब्धता: वह केवल तभी अपने ससुर से संपर्क कर सकती है जब वह अपने मृत पति की संपत्ति, अपने माता-पिता की संपत्ति, या अपने बच्चों और उनकी संपत्तियों से भरण-पोषण प्राप्त करने में पूरी तरह असमर्थ हो।
- संपत्ति का दायरा: अधिनियम की धारा 21 (viii) विधवा को अपने ससुर की संपत्ति से दावा करने का अवसर प्रदान करती है, चाहे वह अपने ससुर की मृत्यु से पहले विधवा हुई हो या बाद में।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह दायित्व पूर्ण (absolute) नहीं है। ससुर केवल उसी सीमा तक उत्तरदायी है जहां तक उसके पास “सहदायिक या पैतृक संपत्ति” (coparcenary or ancestral property) है जिसमें से बहू ने पहले से हिस्सा प्राप्त नहीं किया है। यदि ससुर के पास ऐसी पैतृक संपत्ति से भुगतान करने के साधन नहीं हैं, तो यह दायित्व लागू नहीं किया जा सकता है।
इसके अलावा, भरण-पोषण का अधिकार महिला की वैवाहिक स्थिति पर निर्भर है; यदि महिला दोबारा शादी कर लेती है, तो ससुर का कानूनी दायित्व तुरंत समाप्त हो जाता है।

