SARFAESI कार्रवाई के खिलाफ रिट याचिका विचारणीय नहीं; वैकल्पिक कानूनी उपचार की उपलब्धता के आधार पर आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने केनरा बैंक द्वारा सरफेसी (SARFAESI) अधिनियम, 2002 के तहत शुरू की गई वसूली की कार्रवाई को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कानून में प्रभावी वैकल्पिक उपचार (Alternative Remedy) मौजूद हो, तो न्यायिक विवेक यही कहता है कि अदालत को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने विवेकाधीन अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने से बचना चाहिए।

जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस बालाजी मेडमल्ली की खंडपीठ ने कहा कि सरफेसी अधिनियम अपीलों के लिए एक विशिष्ट पदानुक्रम प्रदान करता है। अदालत ने जोर देकर कहा कि इस “फास्ट ट्रैक प्रक्रिया” को वैधानिक मंचों को दरकिनार करके पटरी से उतरने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, इम्मादी ईश्वर चंद्र विद्या सागर (75 वर्ष), जो मैसर्स वासवी इलेक्ट्रो सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक और बंधककर्ता हैं, ने 17 फरवरी, 2026 के बिक्री नोटिस को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर की थी। बैंक ने इब्राहिमपटनम स्थित उनकी आवासीय संपत्ति का भौतिक कब्जा लेने के लिए सरफेसी अधिनियम की धारा 14 के तहत कार्यवाही शुरू की थी।

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से ‘रिट ऑफ मैंडमस’ जारी करने की मांग की थी। उनका तर्क था कि बैंक को उनके आवासीय भवन को लक्षित करने से पहले अन्य वाणिज्यिक, औद्योगिक और गैर-आवासीय संपत्तियों से वसूली की संभावनाओं को पूरी तरह से समाप्त करना चाहिए था। इसके अलावा, उन्होंने एक स्वतंत्र मूल्यांकनकर्ता के माध्यम से संपत्तियों के नए सिरे से मूल्यांकन की भी मांग की थी।

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पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता की ओर से श्रीमती थोटा सुनीत ने तर्क दिया कि बैंक की कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(g), 21 और 300-A के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने देवरशेट्टी अनसूयम्मा बनाम भारतीय स्टेट बैंक (W.P. No. 5675 of 2016) के मामले का हवाला देते हुए कहा कि बैंक की कार्रवाई कानूनी रूप से सही होने पर भी हाईकोर्ट निर्देश जारी कर सकता है।

केनरा बैंक की ओर से श्री टी.बी.एल. मूर्ति ने दलील दी कि बैंक की कार्यवाही कानून के दायरे में है और याचिकाकर्ता के पास अधिनियम के तहत वैकल्पिक कानूनी उपचार उपलब्ध है।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता सरफेसी अधिनियम की धारा 2(1)(f) के तहत ‘ऋणी’ (borrower) की श्रेणी में आते हैं। चूंकि चुनौती धारा 13(4) के तहत उठाए गए कदमों के खिलाफ थी, इसलिए अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता के पास वैधानिक उपचार उपलब्ध है।

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बोड्डू प्रसाद राव बनाम पंजाब नेशनल बैंक (2024 SCC OnLine AP 5742) के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि अनुच्छेद 226 के तहत याचिकाएं विचारणीय हैं, लेकिन वैकल्पिक उपचार की उपस्थिति में उन्हें सामान्यतः स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

खंडपीठ ने PHR इन्वेंट एजुकेशनल सोसाइटी बनाम यूको बैंक (2024) 6 SCC 579 में सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी को उद्धृत किया:

“यह गंभीर चिंता का विषय है कि इस न्यायालय के बार-बार दिए गए फैसलों के बावजूद, हाईकोर्ट्स द्वारा डीआरटी (DRT) अधिनियम और सरफेसी अधिनियम के तहत वैधानिक उपचारों की उपलब्धता की अनदेखी जारी है और अनुच्छेद 226 के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग कर ऐसे आदेश पारित किए जा रहे हैं जिनका बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों के बकाया वसूली के अधिकार पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।”

अंतरिम रोक (Interim Stay) की मांग पर अदालत ने मंगल राजेंद्र कामथे बनाम तहसीलदार, पुरंदर (2026 SCC OnLine SC 297) का संदर्भ दिया, जिसमें स्थापित किया गया था कि यदि हाईकोर्ट वैकल्पिक उपचार के आधार पर याचिका पर विचार करने से इनकार करता है, तो अंतरिम राहत देना “अनुचित” है।

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हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:

“चूंकि हम वैकल्पिक उपचार के आधार पर रिट याचिका पर ही विचार करने के इच्छुक नहीं हैं, इसलिए कोई भी आगे का निर्देश जारी करने का सवाल ही नहीं उठता और न ही यह कानूनी रूप से उचित होगा।”

निर्णय

वैधानिक उपचार को दरकिनार करने के लिए कोई असाधारण परिस्थिति न पाते हुए, हाईकोर्ट ने रिट याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने खर्च (costs) के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया और सभी लंबित याचिकाओं को भी बंद कर दिया।

केस विवरण

  • केस शीर्षक: इम्मादी ईश्वर चंद्र विद्या सागर बनाम अधिकृत अधिकारी, केनरा बैंक और अन्य
  • केस संख्या: रिट याचिका संख्या 6000/2026
  • पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस बालाजी मेडमल्ली
  • निर्णय की तिथि: 6 मार्च, 2026

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