यूपी एक्साइज एक्ट की धारा 34(2) के तहत लाइसेंस रद्दीकरण विवेकाधीन, अनिवार्य नहीं; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश रद्द किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक देशी शराब की दुकान का लाइसेंस रद्द करने और लाइसेंसधारी को अनिश्चित काल के लिए ब्लैकलिस्ट करने के आदेश को यह कहते हुए निरस्त कर दिया है कि उत्तर प्रदेश आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत लाइसेंस रद्द करने की शक्ति विवेकाधीन (discretionary) है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसे केवल दूसरे लाइसेंस के रद्द होने के परिणाम के रूप में यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल की पीठ ने रिट याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कहा कि अधिकारियों का यह कर्तव्य है कि वे अपने स्वतंत्र विवेक का प्रयोग करें और स्पष्ट रूप से यह दर्ज करें कि किसी व्यक्ति को दूसरी दुकान चलाने की अनुमति देना राजस्व (Revenue) के हित के लिए किस प्रकार हानिकारक होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता विजय कुमार शर्मा के पास मेरठ के मऊ खास और परीक्षितगढ़ गांवों में देशी शराब की दुकानों के लाइसेंस थे। कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान 29 मार्च 2020 को पुलिस ने एक प्राथमिकी (FIR) दर्ज की, जिसमें आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता एक सफेद स्कॉर्पियो कार में शराब का परिवहन कर रहा था।

इसके आधार पर, जिला मजिस्ट्रेट/कलेक्टर मेरठ ने 23 जून 2020 को परीक्षितगढ़ दुकान का लाइसेंस रद्द कर दिया। इसके बाद, 18 सितंबर 2020 को मऊ खास दुकान के लिए भी कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और 13 अक्टूबर 2020 को उस लाइसेंस को भी रद्द कर दिया गया। साथ ही याचिकाकर्ता की जमानत राशि और लाइसेंस फीस जब्त कर ली गई और उसे अनिश्चित काल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। याचिकाकर्ता की अपील भी 7 मार्च 2022 को खारिज कर दी गई थी।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि मऊ खास स्थित दूसरी दुकान के खिलाफ कोई उल्लंघन या शिकायत नहीं थी। उन्होंने दलील दी कि धारा 34(2) विवेकाधीन है और अधिकारी को यह साबित करना चाहिए था कि दूसरी दुकान जारी रखने से राजस्व को नुकसान होगा। वकील ने यह भी बताया कि जिस कार का उपयोग परिवहन के लिए बताया गया, वह एक पुलिस कांस्टेबल की थी, जिसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। साथ ही, अनिश्चितकालीन ब्लैकलिस्टिंग को कानूनन गलत बताया गया।

राज्य सरकार (ACSC) ने याचिका की विचारणीयता पर आपत्ति जताते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के पास धारा 11(2) के तहत रिवीजन (revision) फाइल करने का विकल्प मौजूद था। मेरिट पर सरकार का तर्क था कि एक बार धारा 34(1) के तहत लाइसेंस रद्द होने पर, अधिकारियों के पास धारा 34(2) और नियम 21(3) के तहत अन्य लाइसेंस रद्द करने की शक्ति है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

वैकल्पिक उपचार (Alternative Remedy) के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने गोदरेज सारा ली लिमिटेड बनाम एक्साइज एंड टैक्सेशन ऑफिसर [(2023) SCC Online SC 95] का हवाला देते हुए कहा:

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“वैकल्पिक उपचार की उपलब्धता के आधार पर रिट क्षेत्राधिकार से इनकार करना विवेक का नियम है, न कि मजबूरी का… जहाँ विवाद विशुद्ध रूप से कानूनी हो और जिसमें तथ्यों की जाँच की आवश्यकता न हो, वहाँ हाईकोर्ट अपने विवेक से रिट याचिका पर सुनवाई कर सकता है।”

धारा 34(2) के तहत रद्दीकरण पर हाईकोर्ट ने संदीप सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [Writ Tax No. 278/2020] में दिए गए अपने पिछले फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा:

“यूपी एक्साइज एक्ट की धारा 34(2) विवेकाधीन है, अनिवार्य नहीं। इसे बिना कोई कारण बताए केवल लाइसेंसधारी के किसी अन्य लाइसेंस के रद्द होने के परिणाम के रूप में लागू नहीं किया जा सकता।”

हाईकोर्ट ने पाया कि अधिकारियों ने यह दिखाने के लिए कोई स्वतंत्र निष्कर्ष या कारण दर्ज नहीं किया कि मऊ खास की दुकान राजस्व के लिए कैसे हानिकारक थी। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि उस पुलिस कांस्टेबल के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई जो वाहन का मालिक था।

ब्लैकलिस्टिंग के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को अनिश्चित काल के लिए ब्लैकलिस्ट करना डैफोडिल्स फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड बनाम यूपी राज्य [(2020) 18 SCC 550] और यूनियन ऑफ इंडिया बनाम तरसेम सिंह [(2008) 8 SCC 648] में निर्धारित सिद्धांतों के खिलाफ है। ब्लैकलिस्टिंग की एक निश्चित अवधि होनी चाहिए।

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न्यायालय का निर्णय

हाईकोर्ट ने 13 अक्टूबर 2020 के रद्दीकरण आदेश और 7 मार्च 2022 के अपीलीय आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“यह अदालत पाती है कि न तो कारण बताओ नोटिस में और न ही आदेश में, तथ्यों का कोई ऐसा निष्कर्ष दिया गया है जो यह दिखाए कि याचिकाकर्ता को मऊ खास गांव में दुकान जारी रखने देना राजस्व के हित के लिए हानिकारक है।”

चूंकि आबकारी वर्ष समाप्त हो चुका है, इसलिए हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता अब लाइसेंस जारी रखने का दावा नहीं कर सकता, लेकिन अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे जब्त की गई राशि को तीन महीने के भीतर याचिकाकर्ता को वापस करें।

केस विवरण

  • केस टाइटल: विजय कुमार शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 4 अन्य
  • केस नंबर: रिट टैक्स संख्या 5977 वर्ष 2025
  • बेंच: न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री राज कुमार सिंह, श्री रजत एरेन
  • प्रतिवादी के वकील: श्री रवि शंकर पांडे, एसीएससी
  • तारीख: 24 मार्च 2026

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