संभल गोलीबारी मामला: पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने के आदेश पर हाईकोर्ट की रोक जारी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संभल में हुई एक गोलीबारी की घटना के संबंध में तत्कालीन क्षेत्राधिकारी (CO) अनुज कुमार चौधरी सहित कई पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने के निचली अदालत के आदेश पर अपनी अंतरिम रोक बढ़ा दी है।

हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 21 अप्रैल की तारीख तय की है। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को शिकायतकर्ता द्वारा दाखिल जवाबी हलफनामे पर अपना पक्ष रखने के लिए समय दिया है।

मंगलवार को कोर्ट में तत्कालीन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) विभांशु सुधीर द्वारा 9 जनवरी को पारित आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हुई। कार्यवाही के दौरान, शिकायतकर्ता यामीन के वकील ने एक जवाबी हलफनामा (Counter Affidavit) पेश किया। इसके जवाब में याचिकाकर्ता के वकील ने प्रत्युत्तर (Rejoinder) दाखिल करने के लिए समय मांगा।

न्यायमूर्ति समित गोपाल, जिन्होंने पहले CJM के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगाई थी, उन्होंने नामजद अधिकारियों को मिली अंतरिम राहत को बढ़ा दिया है। हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारी अनुज चौधरी की याचिका और इसी आदेश के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा दायर चुनौती को एक साथ संबद्ध (Club) कर दिया है।

यह पूरा मामला भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173(4) के तहत यामीन द्वारा दायर एक याचिका से जुड़ा है। यामीन का आरोप है कि 24 नवंबर 2024 को सुबह लगभग 8:45 बजे, उनका बेटा आलम संभल के मोहल्ला कोट इलाके में जामा मस्जिद के पास अपनी रेहड़ी पर रस्क और बिस्कुट बेच रहा था।

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शिकायत के अनुसार, पुलिस अधिकारियों ने अचानक भीड़ पर “जान से मारने की नीयत” से फायरिंग कर दी। याचिका में संभल के तत्कालीन क्षेत्राधिकारी अनुज चौधरी और कोतवाली प्रभारी अनुज कुमार तोमर सहित अन्य अज्ञात पुलिसकर्मियों को नामजद किया गया था।

9 जनवरी को दिए गए अपने 11 पन्नों के आदेश में, तत्कालीन CJM सुधीर ने स्पष्ट किया था कि पुलिस आपराधिक कृत्यों को छिपाने के लिए “आधिकारिक कर्तव्य” (Official Duty) की ढाल का उपयोग नहीं कर सकती। मजिस्ट्रेट ने अपने आदेश में लिखा:

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“किसी व्यक्ति पर गोली चलाना आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन नहीं माना जा सकता।”

सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए, CJM ने माना था कि प्रथम दृष्टया एक संज्ञेय अपराध बनता है और सत्य केवल “उचित जांच के माध्यम से ही सामने आ सकता है।” इसी आधार पर उन्होंने FIR दर्ज करने का निर्देश दिया था, जिसे अब हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है।

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