जनगणना में वर्गीकरण नीतिगत मामला, ‘जस्टिसिएबल’ नहीं: गैर-अधिसूचित घुमंतू जनजातियों को अलग श्रेणी में रखने की याचिका सुप्रीम कोर्ट में खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उस जनहित याचिका (PIL) पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें आगामी राष्ट्रीय जनगणना में गैर-अधिसूचित घुमंतू जनजातियों (DNTs) को एक अलग श्रेणी के रूप में शामिल करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने टिप्पणी की कि जनसंख्या गणना और वर्गीकरण पूरी तरह से सरकारी नीति के दायरे में आता है और यह मामला ‘जस्टिसिएबल’ (न्यायसंगत या अदालत द्वारा हस्तक्षेप योग्य) नहीं है।

अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता दक्षिणकुमार बजरंगे को यह छूट दी कि वे भारत के महापंजीयक और जनगणना आयुक्त के समक्ष अपनी मांग रख सकते हैं।

इस जनहित याचिका में जनगणना आयुक्त को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि जनगणना के दौरान गैर-अधिसूचित घुमंतू जनजातियों के सदस्यों की विशेष रूप से पहचान की जाए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि भेदभावपूर्ण ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ के निरस्त होने के बाद, इन समुदायों को राष्ट्रीय योजना और कल्याणकारी योजनाओं में शामिल करने के लिए “सांख्यिकीय दृश्यता” (statistical visibility) की आवश्यकता है ताकि वे पीछे न छूट जाएं।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने स्पष्ट किया कि याचिका में DNT समुदायों के लिए अनुसूचित जनजाति (ST) के दर्जे की मांग नहीं की जा रही है, बल्कि केवल सांख्यिकीय पहचान पर जोर दिया जा रहा है।

अदालत के समक्ष दवे ने कहा, “चूंकि अब (क्रिमिनल ट्राइब्स) एक्ट अस्तित्व में नहीं है… इसलिए कोई ऐसा तरीका होना चाहिए जिससे वे जनगणना से बाहर न रह जाएं और पीछे न छूटें।”

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पीठ ने इस मुकदमे के इरादे और इसके व्यापक सामाजिक प्रभावों पर कड़ा ऐतराज जताया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इस तरह के वर्गीकरण के माध्यम से समाज में और अधिक विभाजन पैदा करने की आवश्यकता पर सवाल उठाए।

चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की, “हम एक अनूठा देश हैं। एक वर्गविहीन समाज बनाने के बजाय, हम यहां और अधिक वर्ग बनाने में लगे हैं।”

चीफ जस्टिस ने यह भी संकेत दिया कि इस तरह की याचिकाएं बाहरी हितों से प्रभावित हो सकती हैं। पीठ ने कहा, “ये बहुत सोची-समझी चालें हैं… हमारे सामने जो चीजें हैं वे इतनी मासूम नहीं हैं। यह याचिका समाज को बांटने की एक गहरी जड़ वाली चाल है। ये भारत के भीतर से नहीं आ रही हैं और अगर हम जांच कराएं, तो पता चल जाएगा कि यह सब कहां से आ रहा है।”

वहीं जस्टिस जोयमाल्य बागची ने जोर देकर कहा कि जनगणना विशेषज्ञों का विषय है। उन्होंने कहा, “यह एक विशेषज्ञ नीतिगत निर्णय है। हमें यह देखना होगा कि वे (सरकार) आपके लिए क्या वर्गीकरण करते हैं।”

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कोर्ट ने एक प्रक्रियात्मक चूक की ओर भी इशारा किया और कहा कि याचिकाकर्ता ने अधिकारियों को आवेदन देने के केवल एक महीने बाद ही अदालत का दरवाजा खटखटा दिया, जिससे सरकार को जवाब देने का पर्याप्त समय नहीं मिला।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका कार्यकारी (Executive) के उन अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती, जिनके तहत गणना की श्रेणियां तय की जाती हैं।

पीठ ने कहा, “हमारी सुविचारित राय में, गणना प्रक्रिया के दौरान वर्गीकरण या उप-वर्गीकरण अनिवार्य रूप से नीतिगत दायरे में आता है, जिस पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्णय लिया जाना चाहिए। यह कोई ‘जस्टिसिएबल’ मुद्दा नहीं है।”

अदालत ने याचिका को यह कहते हुए निपटा दिया कि याचिकाकर्ता अपनी शिकायतों के निवारण के लिए संबंधित सरकारी अधिकारियों से संपर्क करने के लिए स्वतंत्र हैं।

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