दिल्ली हाईकोर्ट ने एक इन्फ्लुएंसर एग्रीमेंट (Influencer Agreement) से उपजे विवादों को सुलझाने के लिए एक एकमात्र मध्यस्थ (Sole Arbitrator) की नियुक्ति की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11 के तहत न्यायिक हस्तक्षेप केवल मध्यस्थता समझौते के प्रथम दृष्टया (prima facie) अस्तित्व की जांच तक ही सीमित होना चाहिए।
अभिनव शुक्ला बनाम मेसर्स ग्रेट रॉकस्पोर्ट प्राइवेट लिमिटेड के मामले की सुनवाई करते हुए, न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर ने जोर दिया कि अदालत की भूमिका केवल सुगमकर्ता और प्रक्रियात्मक है, जिसका उद्देश्य विवाद के गुणों (merits) पर विचार किए बिना मध्यस्थता के लिए पक्षों की आपसी मंशा को प्रभावी बनाना है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता अभिनव शुक्ला ने एक एकमात्र मध्यस्थ की नियुक्ति की मांग करते हुए अधिनियम की धारा 11(6) के तहत याचिका दायर की थी। यह विवाद 22 जनवरी, 2023 के ‘इन्फ्लुएंसर एग्रीमेंट’ से संबंधित है।
समझौते में एक ‘विवाद समाधान’ खंड (Dispute Resolution clause) शामिल था, जिसमें प्रावधान था कि शर्तों की व्याख्या या किसी भी दायित्व के उल्लंघन से संबंधित विवादों को नई दिल्ली में मध्यस्थता के माध्यम से सुलझाया जाएगा। विवाद उत्पन्न होने के बाद, याचिकाकर्ता ने 25 अगस्त, 2025 को अधिनियम की धारा 21 के तहत नोटिस जारी किया था। विवाद का मूल्य लगभग ₹20,00,000/- बताया गया है।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील अभिषेक मोहन गोयल ने कोर्ट को सूचित किया कि प्रतिवादी ने पहले ही मध्यस्थ की नियुक्ति पर कोई आपत्ति न होने की बात स्वीकार की है, जो 16 मार्च, 2026 को संयुक्त रजिस्ट्रार के समक्ष कार्यवाही में दर्ज की गई थी।
प्रतिवादी का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील रजत नागर ने भी इस मामले को मध्यस्थता के लिए भेजने के प्रति अपनी सहमति दोहराई। इसके परिणामस्वरूप, दोनों पक्ष इस संदर्भ में एकमत थे।
कोर्ट का विश्लेषण
न्यायमूर्ति शंकर ने उल्लेख किया कि इस चरण पर न्यायिक जांच का दायरा अब Res Integra (अनछुआ मामला) नहीं रह गया है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम कृष स्पिनिंग (2024) में दिए गए फैसले पर भरोसा किया।
कृष स्पिनिंग के फैसले को उद्धृत करते हुए, हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“मध्यस्थ की नियुक्ति के चरण में जांच का दायरा केवल मध्यस्थता समझौते के प्रथम दृष्टया अस्तित्व की जांच तक सीमित है, और कुछ नहीं।”
कोर्ट ने आगे कहा कि “आई ऑफ द नीडल” (eye of the needle) या “स्पष्ट रूप से निराधार” (ex facie meritless) जैसे पुराने परीक्षण अब आधुनिक मध्यस्थता सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं, जो मध्यस्थता की स्वायत्तता को प्राथमिकता देते हैं। फैसले में कहा गया:
“सक्षमता-सक्षमता (competence-competence) के नकारात्मक प्रभाव के लिए यह आवश्यक है कि मध्यस्थता ट्रिब्यूनल के विशेष अधिकार क्षेत्र में आने वाले मामले को रेफरल कोर्ट द्वारा नहीं देखा जाना चाहिए, यहां तक कि प्रथम दृष्टया निर्धारण के लिए भी नहीं, जब तक कि ट्रिब्यूनल को पहले इसे देखने का अवसर न मिले।”
कोर्ट ने समझाया कि मध्यस्थता ट्रिब्यूनल “समझौता और संतुष्टि” (accord and satisfaction) या “मुकदमेबाजी में बेईमानी” जैसे मुद्दों पर निर्णय लेने के लिए बेहतर स्थिति में है क्योंकि उसके पास विस्तृत दलीलें और साक्ष्य मौजूद होते हैं।
कोर्ट का निर्णय
मध्यस्थता समझौते को वैध मानते हुए और दोनों पक्षों की सहमति को देखते हुए, हाईकोर्ट ने सुश्री विजयता एम. भल्ला, अधिवक्ता को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया।
कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- मध्यस्थ अधिनियम की धारा 12(2) के तहत आवश्यक प्रकटीकरण (disclosures) प्रस्तुत करेंगी।
- मध्यस्थ का शुल्क अधिनियम की चौथी अनुसूची के अनुसार या पक्षों के बीच आपसी सहमति के अनुसार होगा।
- मध्यस्थता शुल्क और लागत दोनों पक्षों द्वारा समान रूप से वहन की जाएगी।
- दावों और प्रति-दावों के संबंध में पक्षों के सभी अधिकार और दलीलें खुली रखी गई हैं, जिन पर मध्यस्थ द्वारा गुण-दोष के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।
कोर्ट ने अंत में स्पष्ट किया कि इस आदेश की किसी भी बात को विवाद के गुण-दोष पर कोर्ट की राय के रूप में नहीं माना जाना चाहिए।
मामले का विवरण:
- मामले का शीर्षक: अभिनव शुक्ला बनाम मेसर्स ग्रेट रॉकस्पोर्ट प्राइवेट लिमिटेड
- केस संख्या: ARB.P. 2117/2025
- बेंच: न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर
- निर्णय की तिथि: 19 मार्च, 2026

