नाबालिग के रूप में गिरफ़्तार व्यक्ति को 21 साल जेल में रखना कानून के विरुद्ध: कलकत्ता हाईकोर्ट ने बांग्लादेशी कैदी की तत्काल रिहाई का आदेश दिया

कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में 21 वर्षों से जेल में बंद एक बांग्लादेशी नागरिक की तत्काल रिहाई के निर्देश दिए हैं। अदालत ने पाया कि जब उसे भारत में अवैध प्रवेश के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, तब वह नाबालिग था। इसलिए उसे इतने लंबे समय तक कारावास में रखना किशोर न्याय कानून के विपरीत है। अदालत ने राज्य सरकार को उसके मूल देश बांग्लादेश भेजने के लिए आवश्यक कदम उठाने का भी निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति राजशेखर मंथा और न्यायमूर्ति राय चट्टोपाध्याय की खंडपीठ ने गुरुवार को यह आदेश पारित किया। अदालत के समक्ष प्रस्तुत रिपोर्ट में बताया गया कि संबंधित व्यक्ति फरवरी 2005 में गिरफ्तार होने के बाद से अब तक 21 वर्ष से अधिक समय जेल में बिता चुका है, जबकि वर्तमान में उसकी उम्र लगभग 36 वर्ष है।

मामले में नाबालिग होने के दावे की जांच के लिए उत्तर 24 परगना जिले के बशीरहाट के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश से रिपोर्ट मंगाई गई थी। अदालत को दी गई रिपोर्ट के अनुसार, आरोपी का ऑसिफिकेशन टेस्ट कराया गया, जिससे उसकी वर्तमान आयु 36 वर्ष आंकी गई।

खंडपीठ ने इस रिपोर्ट के आधार पर माना कि 8 फरवरी 2005 को गिरफ्तारी के समय वह नाबालिग था। अदालत ने कहा कि किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम के तहत किसी भी किशोर को अधिकतम सात वर्ष से अधिक अवधि तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता।

चूंकि संबंधित व्यक्ति 21 वर्ष से अधिक समय से जेल में बंद था, इसलिए अदालत ने उसकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया और राज्य को निर्देश दिया कि उसे बांग्लादेश वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू की जाए।

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इसी दिन खंडपीठ ने एक अन्य मामले में भी समान आधार पर राहत देते हुए एक व्यक्ति की रिहाई का आदेश दिया, जो गिरफ्तारी के समय नाबालिग था और पिछले 14 वर्षों से जेल में बंद था।

इस मामले में बिरभूम जिले के रामपुरहाट स्थित फास्ट ट्रैक कोर्ट के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश की रिपोर्ट अदालत के सामने रखी गई। रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया कि 27 फरवरी 2011 को घटना के समय आरोपी की उम्र 15 वर्ष और 9 दिन थी।

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अदालत ने कहा कि जब कानून के अनुसार किसी किशोर को सात वर्ष से अधिक कारावास नहीं दिया जा सकता, तो 14 वर्ष से अधिक समय तक हिरासत में रखना न्यायसंगत नहीं है। इस आधार पर अदालत ने उसे भी तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।

हाईकोर्ट के इन आदेशों ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि किशोर न्याय कानून के तहत नाबालिगों के अधिकारों की अनदेखी कर लंबे समय तक उन्हें जेल में नहीं रखा जा सकता।

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