रिटायर्ड हाईकोर्ट जजों की सुविधाओं में समानता के लिए बनेगा राष्ट्रीय पैनल, सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को निर्देश

देश के अलग-अलग राज्यों में हाईकोर्ट के रिटायर्ड जजों को मिलने वाली सुविधाओं में भारी अंतर को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को दो हफ्ते के भीतर एक उच्च स्तरीय राष्ट्रीय समिति (पैनल) बनाने का निर्देश दिया है। यह समिति देश भर के सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जजों के लिए एक समान राष्ट्रीय नीति तैयार करेगी, जिससे उन्हें मिलने वाले पोस्ट-रिटायरमेंट फायदों जैसे ड्राइवर, सुरक्षा और यात्रा के दौरान सरकारी आवास की सुविधा में समानता लाई जा सके।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की तीन सदस्यीय बेंच ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह इस समिति का गठन कर तीन महीने के भीतर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपे। यह निर्देश सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के रिटायर्ड जजों के एसोसिएशन के अध्यक्ष जस्टिस वीएस दवे द्वारा दायर एक अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। इस याचिका में रिटायर्ड जजों की सुरक्षा और अन्य सुविधाओं से जुड़ी चिंताओं को उठाया गया था।

राज्यों के बीच सुविधाओं में बड़ा अंतर

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने अपने लिखित आदेश में स्पष्ट किया कि यह मामला रिटायर्ड चीफ जस्टिस और हाईकोर्ट के जजों को मिलने वाली विभिन्न सुविधाओं से जुड़ा है। कोर्ट ने पाया कि घरेलू सहायक (डोमेस्टिक हेल्प), ड्राइवर, टेलीफोन की सुविधा, मेडिकल रीइंबर्समेंट और यात्रा के दौरान सरकारी आवासों में रुकने जैसी बुनियादी सुविधाएं अलग-अलग राज्यों में बहुत भिन्न हैं। इस असमानता के कारण ही रिटायर्ड जजों के संगठन को पहले प्रशासनिक अधिकारियों और फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख करना पड़ा।

क्या 50 हजार रुपये में ड्राइवर और सुरक्षा गार्ड संभव है?

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सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने राज्यों द्वारा दी जाने वाली वित्तीय सहायता की व्यावहारिक उपयोगिता पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि क्या 45,000 से 50,000 रुपये के मासिक भत्ते में किसी रिटायर्ड जज के लिए एक पेशेवर ड्राइवर और सुरक्षाकर्मी रखना व्यावहारिक रूप से संभव है?

चीफ जस्टिस ने सुझाव दिया कि केंद्र सरकार को इसके लिए एक मानक तय करना चाहिए और राज्यों पर पड़ने वाले अतिरिक्त वित्तीय बोझ को कम करने के लिए मैचिंग ग्रांट (वित्तीय सहायता) देने पर विचार करना चाहिए। कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि यदि केंद्र ने समय पर समिति का गठन नहीं किया, तो सुप्रीम कोर्ट खुद ऐसी समिति बना देगा।

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केंद्र सरकार की सहमति

केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट के इस प्रस्ताव पर सहमति जताई। उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसी समिति गठित करने में कोई आपत्ति नहीं है और वह कोर्ट की चिंताओं और भावना के अनुरूप इस मुद्दे का समाधान निकालेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि केंद्र इस मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण पक्षकार है, क्योंकि नई राष्ट्रीय नीति लागू होने के बाद राज्यों के साथ इसके वित्तीय बोझ को साझा करने में केंद्र की बड़ी भूमिका होगी।

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